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RakshaVimarsh | रक्षा विश्लेषण, सैन्य समाचार और सामरिक अध्ययन > Blog > रक्षा तकनीक > ड्रोन तकनीक > घातक यूसीएवी: ख़तरा चीन से है, पर देरी का कारण भारत के भीतर है
ड्रोन तकनीकरक्षा तकनीक

घातक यूसीएवी: ख़तरा चीन से है, पर देरी का कारण भारत के भीतर है

घातक यूसीएवी केवल एक ड्रोन परियोजना नहीं है। यह भारत की स्टेल्थ तकनीक, कार्बन कंपोजिट निर्माण क्षमता और भविष्य की हवाई युद्ध रणनीति की वास्तविक परीक्षा बनती जा रही है।

रक्षा विमर्श Logo
Last updated: June 9, 2026 4:40 pm
रक्षा विमर्श विश्लेषण टीम
2 months ago
घातक यूसीएवी भारत की स्टेल्थ ड्रोन रणनीति का असली परीक्षण
घातक यूसीएवी और भारत की छिपी हुई हवाई युद्ध रणनीति
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27 मार्च 2026 को रक्षा अधिग्रहण परिषद ने लगभग साठ घातक मानवरहित युद्धक विमानों की खरीद को मंज़ूरी दी। आधिकारिक भाषा में इन्हें अब Remotely Piloted Strike Aircraft (RPSA) कहा जा रहा है। लागत का अनुमान करीब उन्तालीस हज़ार करोड़ रुपये बताया गया। अधिकांश हिंदी रिपोर्टों ने इसे एक ही चश्मे से देखा। स्टेल्थ। फ्लाइंग विंग। चीन के Sharp Sword का भारतीय जवाब।

यह framing आधी सही है, और इसीलिए अधूरी है।

घातक किस युद्ध के लिए बना है, इसका उत्तर सीमा पार है। पर घातक क्यों इतना धीमा है, किस इंजन पर टिका है, और किस मॉडल से बनेगा, इसका उत्तर भारत के भीतर है। दो अलग सवाल हैं। और हिंदी रक्षा लेखन इन्हें अक्सर एक मान लेता है। इस लेख का तर्क यही फ़र्क खोलने की कोशिश है। बाहर एक असली ख़तरा है जो इस हथियार को ज़रूरी बनाता है। भीतर एक असली अड़चन है जो इस हथियार को टालती रहती है। दोनों को साथ देखना ज़रूरी है।

घातक की असली बहस उस पंखे में है जो उसे उड़ाएगा

स्टेल्थ डिजाइन की चर्चा संतोषजनक होती है। आकार दिखता है, समझ आता है, तस्वीर अच्छी लगती है। पर किसी भी लड़ाकू विमान में सबसे कठिन घटक उसका इंजन होता है। दुनिया में चार-पाँच देश ही फाइटर-क्लास जेट इंजन बना पाते हैं। एयरफ्रेम कई बना लेते हैं। यही असली विभाजक रेखा है।

घातक को शक्ति देने वाला इंजन ड्राई कावेरी है, जिसे Kaveri Derivative Engine (KDE) भी कहा जाता है। यह बिना आफ्टरबर्नर वाला संस्करण है, और ज़मीनी परीक्षणों में इसने लगभग उनचास से इक्यावन किलोन्यूटन तक का थ्रस्ट दिखाया है। एक सबसोनिक, सहनशक्ति-केंद्रित ड्रोन के लिए यह पर्याप्त माना जा रहा है।

पर इस इंजन की कहानी यहीं से दिलचस्प होती है, और थोड़ी उदास भी।

कावेरी कार्यक्रम 1989 में शुरू हुआ था। इरादा था कि यह तेजस को उड़ाए। यह लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। 2008 में कावेरी को औपचारिक रूप से तेजस से अलग कर दिया गया। तीन दशक की मेहनत एक ऐसे इंजन में बदली जो किसी फाइटर की रीढ़ नहीं बन सका। फिर उसे एक नया जीवन मिला। एक ऐसे प्लेटफॉर्म पर, जो उससे कम माँगता है।

यहीं घातक का सबसे कम समझा गया सच छिपा है। हम आमतौर पर मानते हैं कि प्लेटफॉर्म को इंजन की ज़रूरत होती है। घातक के मामले में उल्टा भी सच है। इंजन को एक प्लेटफॉर्म की ज़रूरत थी। फाइटर इंजन से माँग अलग होती है। उसे आफ्टरबर्नर के साथ सुपरसोनिक गति देनी होती है, बार-बार थ्रस्ट बदलना होता है, चरम तापमान झेलना होता है।

एक स्टेल्थ ड्रोन को इनमें से अधिकांश की ज़रूरत नहीं। उसे चाहिए लंबी उड़ान, कम ईंधन खपत, और कम इन्फ्रारेड हस्ताक्षर। जो चीज़ कावेरी को फाइटर के लिए अपर्याप्त बनाती है, वही उसे ड्रोन के लिए उपयुक्त बना देती है।

यह कमज़ोरी को समझदारी में बदलने जैसा है। पर एक जोखिम यहीं बैठा है, और उसे छिपाना बेईमानी होगी। पूरा घातक कार्यक्रम एक ऐसे इंजन पर टिका है जो अब तक किसी भारतीय विमान में नियमित रूप से उड़ा नहीं है।

रिपोर्टों के अनुसार इसका प्रमाणन 2026 के अंत तक लक्षित है, और उड़ान परीक्षण के लिए इसे रूस में एक संशोधित Il-76 परिवहन विमान पर एक उड़ने वाली प्रयोगशाला की तरह लगाने की योजना रही है।

ज़रा इस तस्वीर पर रुकिए। भारत का स्वदेशी इंजन, भारत के स्वदेशी ड्रोन का दिल, उसका सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण एक रूसी परिवहन विमान के पंख के नीचे लटककर करना पड़ रहा है। आत्मनिर्भरता की कहानी में यह एक असुविधाजनक लेकिन सच्चा दृश्य है।

यदि कावेरी का प्रमाणन पिछड़ता है, तो घातक उसी अनुपात में पिछड़ेगा। एयरफ्रेम तैयार हो भी जाए, तो वह बिना भरोसेमंद इंजन के एक प्रदर्शनी का टुकड़ा बना रहेगा। तेजस ने यह दर्द पहले झेला है।

कार्बन कंपोजिट वह असली परीक्षा है जिसकी तस्वीर नहीं बनती

स्टेल्थ को लोग आकार समझते हैं। आकार उसका सिर्फ़ आधा है। बाकी आधा उस सामग्री में है जिससे विमान बनता है, और जिस सटीकता से बनता है।

रिपोर्टों के अनुसार घातक यूसीएवी के ढाँचे का नब्बे प्रतिशत से अधिक हिस्सा कार्बन कंपोजिट का होगा। यह सामग्री धातु से हल्की होती है, और रडार तरंगों को अलग ढंग से परावर्तित करती है। इससे विमान का रडार क्रॉस सेक्शन घटाया जा सकता है। पर यहाँ एक बारीक़ अंतर समझना ज़रूरी है, जिसे ज़्यादातर लेखन छोड़ देता है।

पुराने स्टेल्थ विमान मुख्यतः रडार सोखने वाली कोटिंग पर निर्भर थे। समस्या यह थी कि वह कोटिंग बहुत रखरखाव माँगती थी, मौसम से जल्दी ख़राब होती थी, और हर उड़ान के बाद देखभाल चाहती थी।

यदि भारत कम पहचान क्षमता को कोटिंग के बजाय कंपोजिट संरचना में ही पिरो दे, तो वह अधिक टिकाऊ रास्ता होगा। बढ़त बाहर लगाई गई परत में नहीं, ढाँचे के भीतर बुनी होगी।

यहीं घातक रक्षा परियोजना से आगे बढ़कर एक औद्योगिक परीक्षा बन जाता है। कंपोजिट निर्माण में अत्यधिक सटीकता चाहिए। तापमान का सख़्त नियंत्रण, परत-दर-परत बुनाई, और हर टुकड़े की गुणवत्ता जाँच। एक माइक्रोन की चूक रडार हस्ताक्षर बढ़ा देती है।

भारत का निजी रक्षा उद्योग अभी इस स्तर की निरंतर, दोहराने योग्य उत्पादन क्षमता बनाने की प्रक्रिया में ही है। एक प्रोटोटाइप बना लेना एक बात है। साठ विमान एक समान गुणवत्ता पर बनाना बिलकुल दूसरी।

और यही वह जगह है जहाँ घातक यूसीएवी का असली प्रतिफल छिपा है। यदि भारत यह क्षमता हासिल कर लेता है, तो उसका उपयोग ड्रोन तक सीमित नहीं रहेगा। वही कंपोजिट जानकारी, वही उत्पादन अनुशासन, भविष्य के लड़ाकू विमान, दूर तक मार करने वाली स्टेल्थ मिसाइलों, और नौसैनिक प्रणालियों में काम आएगा। घातक एक प्लेटफॉर्म है। पर उससे बड़ी चीज़ वह कारख़ाना है जो उसे बनाने की कोशिश में खड़ा होगा।

सवाल सिर्फ मशीन का नहीं, उस मॉडल का है जिससे वह बनेगी

अब उस बिंदु पर आते हैं जिसे लगभग हर रिपोर्ट छोड़ देती है, और जो शायद स्टेल्थ से भी अधिक मायने रखता है।

घातक यूसीएवी को Development cum Production Partner (DcPP) मॉडल के तहत बनाया जाएगा। आसान भाषा में, DRDO अकेले विकास नहीं करेगा। एक बड़ा भागीदार शुरुआत से ही जुड़ेगा, जो विकास के साथ-साथ उत्पादन की तैयारी भी करता चलेगा।

यह सुनने में प्रशासनिक ब्योरा लगता है। यह असल में भारत की सबसे पुरानी रक्षा बीमारी का इलाज करने की कोशिश है।

भारत की समस्या कभी डिजाइन नहीं रही। समस्या उसे उत्पादन में बदलने की रही है। DRDO एक प्रोटोटाइप बना देता है। फिर वह उत्पादन तक पहुँचने में वर्षों खो देता है, क्योंकि बनाने वाली एजेंसी विकास के समय मौजूद ही नहीं थी। इस खाई को रक्षा हलकों में मौत की घाटी कहा जाता है।

कई शानदार भारतीय प्रोटोटाइप इसी घाटी में दफ़न हैं। DcPP इस खाई को पाटने की कोशिश है। यदि यह मॉडल घातक पर सफल होता है, तो इसका असर घातक से कहीं आगे जाएगा। यह तय करेगा कि भारत भविष्य में अपने जटिल हथियार कैसे बनाता है।

यहीं एक बात साफ़ कहनी ज़रूरी है। घातक यूसीएवी की धीमी रफ़्तार का कारण चीन नहीं है। यह कहना सुविधाजनक है कि भारत Sharp Sword के जवाब में जल्दबाज़ी में यह बना रहा है, पर ज़मीनी सच उल्टा है। घातक धीमा इसलिए है क्योंकि इंजन तीन दशक से भटक रहा था, क्योंकि खरीद की प्रक्रिया जड़ है, और क्योंकि DRDO, सार्वजनिक उपक्रम और निजी क्षेत्र के बीच की दूरी अभी पटी नहीं।

बजट का वह दबाव भी है, जहाँ वेतन और पेंशन का राजस्व व्यय पूँजीगत व्यय को निगलता जा रहा है।

यानी घातक यूसीएवी का ‘क्यों ‘ चीन में है, पर घातक का ‘कब’ और ‘कैसे ‘ भारत के भीतर है। दोनों को आपस में मिला देना विश्लेषण की सबसे आम भूल है।

घातक यूसीएवी किस युद्ध के लिए बना है, इसका उत्तर तिब्बत के पठार पर है

अब उस ख़तरे पर आते हैं जो इस पूरे खर्च को तर्कसंगत बनाता है। और जिसे कम आँकना विश्लेषण को कमज़ोर कर देगा।

गलवान के बाद चीन ने तिब्बत और शिनजियांग में सैन्य ढाँचा अभूतपूर्व गति से खड़ा किया है। रिपोर्टों और उपग्रह चित्रों के अनुसार लद्दाख और अरुणाचल के सामने सोलह के क़रीब नए या विस्तारित वायुसैनिक अड्डे बने हैं। मज़बूत विमान आश्रय, बढ़े हुए एप्रन, और एकीकृत मिसाइल ठिकाने।

यह मौसमी तैनाती से साल भर की उपस्थिति की ओर बदलाव है। चीन का निष्कर्ष सीधा है। जो पक्ष ऊँचाई पर तेज़ी से हवाई शक्ति, सटीक मार और निगरानी जुटा लेगा, वही संकट की शर्तें तय करेगा।

इस ढाँचे की रीढ़ है पश्चिमी थिएटर कमांड, जिसका मुख्यालय चेंगदू में है, और जिसके ज़िम्मे भारत से लगी पूरी सीमा है। उसके पीछे खड़ी है एक बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली। चीन के पास HQ-9B है, जिसकी मार दो सौ पचास से तीन सौ किलोमीटर तक बताई जाती है।

उसके पास रूस से लिया गया S-400 भी है, वही प्रणाली जो भारत के पास भी है। इनके नीचे मध्यम और छोटी दूरी की कई परतें हैं। इस पूरी संरचना का उद्देश्य एक ही है। भारतीय विमानों के लिए चीनी क्षेत्र में घुसना महँगा बना देना।

इसमें एक दूसरा आयाम जोड़िए। चीन की रॉकेट फोर्स के पास इतनी सतह-से-सतह मिसाइलें हैं कि वह भारतीय हवाई अड्डों को कुछ समय के लिए बंद रखने की कोशिश कर सकती है। 2020 के एक हार्वर्ड अध्ययन का अनुमान था कि एक हवाई अड्डे को चौबीस घंटे ठप रखने के लिए लगभग दो सौ बीस बैलिस्टिक मिसाइलें चाहिए होंगी।

संख्या पर बहस हो सकती है, इरादे पर नहीं। युद्ध की पहली रात भारतीय रनवे और मानवयुक्त विमान दोनों दबाव में होंगे। ऐसी स्थिति में एक मानवरहित, बिखेरकर तैनात किया जा सकने वाला स्ट्राइक प्लेटफॉर्म अचानक बहुत क़ीमती हो जाता है।

पर एक और सच है, जिसे घबराहट में भूल जाना आसान है। बहु-स्तरीय वायु रक्षा अजेय नहीं होती। मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव के दौरान, रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान में तैनात चीनी HQ-9 प्रणालियाँ कुछ ठिकानों की रक्षा करने में नाकाम रहीं, और उन्हें ठीक उसी तरह के सटीक और मँडराने वाले हथियारों से निशाना बनाया गया जिनसे बचाव उनका काम था। यह एक संकेत है, गारंटी नहीं। पर यह घातक की भूमिका को परिभाषित करता है।

एक स्टेल्थ ड्रोन और दूरी से मार करने वाले हथियार मिलकर इसी सघन रक्षा में एक दरार खोल सकते हैं। दुश्मन के रडार और कमांड नोड को कुछ देर के लिए अंधा कर सकते हैं। और उस खुले गलियारे से मानवयुक्त विमान अपेक्षाकृत सुरक्षित होकर गुज़र सकते हैं।

यहाँ एक संख्या पूरी बात को ज़मीन पर ले आती है। उन्तालीस हज़ार करोड़ में साठ घातक का अर्थ है प्रति विमान औसतन लगभग साढ़े छह सौ करोड़, और इसमें विकास की लागत भी शामिल है, इसलिए उत्पादन-लागत इससे कम बैठेगी। तुलना के लिए, एक राफेल की कीमत हथियारों और ढाँचे सहित कई गुना अधिक थी। पर असली फ़र्क कीमत में नहीं, जोखिम में है। घातक के गिरने पर कोई पायलट नहीं मरता, कोई युद्धबंदी नहीं बनता, कोई राजनीतिक संकट नहीं खड़ा होता। यही गणित उस सघन हवाई रक्षा में घुसने को सोचने योग्य बनाता है, जिसमें किसी मानवयुक्त विमान को भेजना भारी पड़ता।

क्षमता पहले आ रही है, और सिद्धांत पीछे छूट रहा है

मान लीजिए इंजन प्रमाणित हो गया। मान लीजिए कंपोजिट उद्योग खड़ा हो गया, DcPP काम कर गया, और 2034 के आसपास साठ घातक तैयार खड़े हैं। तब एक और सवाल खड़ा होता है, जो तकनीकी नहीं, सैद्धांतिक है। इन्हें चलाएगा कौन, और किस ढाँचे में?

घातक यूसीएवी एक गहरी मारक क्षमता वाला, दुश्मन के क्षेत्र में घुसकर वार करने वाला हथियार है। यह आक्रामक हवाई शक्ति का औज़ार है। पर भारतीय वायुसेना की मूल सोच लंबे समय से रक्षात्मक रही है। 1971 के बाद भारत ने कोई बड़ा, निरंतर आक्रामक हवाई अभियान नहीं चलाया।

बालाकोट भी एक इकलौती छापेमारी थी, कोई स्थायी सिद्धांत नहीं। अब भारत साठ ऐसे प्लेटफॉर्म खरीद रहा है जिनकी पूरी उपयोगिता आक्रामक प्रवेश में है।

यहीं क्षमता, मुद्रा और सिद्धांत के बीच का फ़र्क समझना ज़रूरी है, जिसे अधिकांश हिंदी रक्षा लेखन घालमेल कर देता है। क्षमता का अर्थ है आपके पास क्या है। मुद्रा का अर्थ है आप उसे कहाँ और कैसे तैनात करते हैं। सिद्धांत का अर्थ है आप उससे लड़ते कैसे हैं। घातक क्षमता दे देगा। मुद्रा और सिद्धांत अभी बनने हैं।

एक और परत है, और यह सबसे महत्वपूर्ण है। मानवरहित विमान को मानवयुक्त लड़ाकू विमान के साथ जोड़कर लड़ाना एक नया अनुशासन है, जिसे दुनिया Manned-Unmanned Teaming कहती है। इसके लिए चाहिए पहचान से प्रहार तक की पूरी कड़ी, यानी सेंसर जो लक्ष्य देखे, नेटवर्क जो डेटा पहुँचाए, और हथियार जो उसे मारे, ये सब एक साथ जुड़े हुए।

इसके लिए चाहिए उपग्रह आधारित निगरानी, भरोसेमंद डेटा लिंक, और यह तय करने का तंत्र कि संकट के क्षण में निर्णय कौन लेता है। युद्ध में संचार टूटता है, GPS संकेत जाम होते हैं। ऐसे में ड्रोन को स्वयं सीमित निर्णय लेने की क्षमता चाहिए।

और यहीं स्वायत्तता का सवाल आता है, जिसे इस पूरी बहस में अक्सर मान लिया जाता है, सुलझाया नहीं जाता। चीनी हवाई रक्षा वाले माहौल में डेटा लिंक टूटेंगे, उपग्रह संकेत जाम होंगे, और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध पूरे नेटवर्क को धुँधला कर देगा। ऐसे क्षण में घातक की पूरी उपयोगिता इस पर टिकेगी कि वह अकेला कितना कर सकता है। लक्ष्य पहचानना, रास्ता बदलना, मिशन जारी रखना, ये निर्णय उसे ज़मीन से लगातार आदेश मिले बिना लेने होंगे।

यहीं एक असहज सच भी है। जितनी अधिक स्वायत्तता, उतना ही कठिन यह सवाल कि जब कोई मशीन लक्ष्य चुने और चूक जाए, तो उत्तरदायी कौन है। भारत ने यह हार्डवेयर मँगा लिया है। इस सवाल का उत्तर अभी कहीं लिखा नहीं गया।

बात इतनी सीधी नहीं है। भारत अभी थिएटर कमांड की बहस में ही उलझा है। संयुक्तता अभी पूरी तरह बनी नहीं। उपग्रह निगरानी और लक्ष्य-निर्धारण की कड़ी अभी अधूरी है। ऐसे में हम उस भविष्य का हार्डवेयर ख़रीद रहे हैं जिसका सॉफ्टवेयर, यानी कमांड, नेटवर्क और सिद्धांत, अभी लिखा जाना बाकी है।

और यहीं इस लेख की सबसे तीखी बात कहनी होगी। एक स्टेल्थ ड्रोन, जिसके पीछे एकीकृत निगरानी और लक्ष्य-निर्धारण की कड़ी न हो, महज़ एक कठिन-से-पकड़ में आने वाला अकेला विमान है। प्लेटफॉर्म अकेले नहीं लड़ते। पूरी संरचना लड़ती है।

स्टेल्थ एक स्थायी कवच नहीं, और घातक यूसीएवी का अंतिम गंतव्य शायद AMCA है

अब उस आशंका पर आते हैं जो इस कार्यक्रम के सिर पर मँडराती है। समय।

घातक यूसीएवी के लगभग 2034 तक सेवा में आने का अनुमान है। यानी आज से लगभग आठ साल बाद। समस्या यह है कि स्टेल्थ कोई स्थिर लाभ नहीं है। दुनिया अब काउंटर-स्टेल्थ की ओर बढ़ रही है।

कम आवृत्ति वाले रडार, कई जगहों से एक साथ काम करने वाले बिखरे रडार नेटवर्क, और इन्फ्रारेड पर आधारित निष्क्रिय पहचान प्रणालियाँ धीरे-धीरे स्टेल्थ के पुराने नियमों को कमज़ोर कर रही हैं। जो आकार आज रडार से बच जाता है, वह एक दशक बाद कई सेंसरों के जोड़ से पकड़ा जा सकता है।

तो क्या भारत एक ऐसी दौड़ में देर से घुस रहा है जिसका अगला चरण पहले ही शुरू हो चुका है?

आंशिक रूप से, हाँ। पर यह पूरा सच नहीं, और यहीं मैं एक स्पष्ट राय रखूँगा।

घातक यूसीएवी का सबसे बड़ा रणनीतिक योगदान शायद एक हथियार के रूप में नहीं, एक प्रयोगशाला के रूप में होगा। जो स्टेल्थ आकार, कंपोजिट निर्माण, बिना पूँछ वाले अस्थिर विमान को उड़ाने के नियंत्रण नियम, स्वायत्त मिशन प्रबंधन, और इंजन एकीकरण घातक के लिए विकसित होंगे, वे सीधे Advanced Medium Combat Aircraft (AMCA) में काम आएँगे।

दिसंबर 2023 में चित्रदुर्ग में SWiFT प्रदर्शक ने बिना ज़मीनी रडार के स्वयं उतरकर यही नींव रखी थी। ड्राई कावेरी का प्रमाणन भारत के पूरे इंजन कार्यक्रम का दरवाज़ा खोलता है, क्योंकि AMCA के बड़े इंजन तक का रास्ता उसी टेस्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर से होकर जाता है।

इस तरह देखें तो घातक यूसीएवी एक जोखिम घटाने वाला कदम है। वह AMCA की कठिन तकनीकों को एक सस्ते, मानवरहित, कम दबाव वाले प्लेटफॉर्म पर पहले आज़मा लेने का मौका देता है। यह रास्ता नया नहीं है। अमेरिका ने भी X-47B जैसे मानवरहित प्रदर्शकों पर स्टेल्थ नियंत्रण, स्वायत्तता और कैरियर के डेक से संचालन पहले परिपक्व किए, और फिर वह जानकारी अगली पीढ़ी की प्रणालियों में डाली।

भारत के लिए घातक यूसीएवी ठीक वैसा ही तकनीकी पुल बन सकता है। यदि घातक पर स्टेल्थ और स्वायत्तता सध जाती है, तो AMCA का जोखिम उसी अनुपात में घटता है।

घातक इस पारिस्थितिकी का अकेला सदस्य भी नहीं है। HAL का CATS Warrior, लगभग सवा दो टन का एक हल्का साथी ड्रोन, अलग दिशा से उसी भविष्य की ओर बढ़ रहा है। वायुसेना उसकी सौ इकाइयों तक की रुचि दिखा चुकी है। एक भारी घातक गहरे प्रवेश के लिए, एक हल्का Warrior लड़ाकू विमानों के साथ उड़ने के लिए। दोनों मिलकर एक ही सोच के दो छोर हैं। पायलट को सबसे ख़तरनाक जगह से हटाना, और मशीन को आगे भेजना।

घातक यूसीएवी: जो सवाल मंज़ूरी के बाद भी अनसुलझा है

घातक यूसीएवी भारत की एयरोस्पेस महत्वाकांक्षा का सबसे ईमानदार आईना है। उसमें भारत की ताकत भी दिखती है और उसकी अड़चनें भी। डिजाइन कर लेना, पर उत्पादन तक पहुँचने में लड़खड़ाना। स्वदेशी कहना, पर सबसे नाज़ुक कड़ी पर अब भी बाहर देखना। भविष्य का हार्डवेयर ख़रीद लेना, पर उसका सिद्धांत बाद के लिए टाल देना।

असली सवाल तकनीक का नहीं है। भारत स्टेल्थ ड्रोन बना सकता है, यह अब लगभग तय है। बाहर का ख़तरा भी असली है, तिब्बत के पठार पर खड़ी हो रही चीनी वायु रक्षा घातक जैसी क्षमता को ज़रूरी बना देती है। पर असली सवाल इन दोनों के बीच की दौड़ का है।

और वह सवाल यह नहीं कि घातक उड़ेगा या नहीं। वह उड़ेगा, किसी न किसी रूप में। सवाल यह है कि जब 2034 में घातक सेवा में आएगा, तब तक क्या भारत ने उसके लिए ज़रूरी निगरानी का नेटवर्क, पहचान से प्रहार तक की कड़ी, संयुक्त थिएटर कमांड, और आक्रामक हवाई युद्ध का सिद्धांत भी बना लिया होगा? क्योंकि उस दिन घातक यूसीएवी एक हथियार होगा या सिर्फ़ एक उड़ता हुआ प्रदर्शन, यह घातक तय नहीं करेगा।

वह सब कुछ तय करेगा जो घातक के इर्द-गिर्द बनना बाकी है। हथियार आ रहा है। पर आज के युद्ध में हथियार सबसे कम कठिन हिस्सा है। असली चीज़ वह नेटवर्क है जो उसे आँखें देता है, राह दिखाता है, और सही क्षण पर सही लक्ष्य तक ले जाता है। सवाल यह है कि उसके चारों ओर की पूरी सेना समय पर बदल पाएगी या नहीं।

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