भारतीय सेना अब ऐसी स्वदेशी घूमकर हमला करने वाली मारक प्रणाली विकसित करना चाहती है जिसे सीधे T-72, T-90 और अर्जुन टैंकों के मौजूदा 81mm धुआं ग्रेनेड प्रक्षेपक से छोड़ा जा सके। पहली नजर में यह केवल एक नई सैन्य तकनीक की मांग लग सकती है, लेकिन असल में यह भारतीय बख्तरबंद युद्ध सोच में बड़े बदलाव का संकेत है। सेना अब यह समझ चुकी है कि आधुनिक युद्ध में केवल मोटा कवच और बड़ी तोप काफी नहीं है। जो पहले दुश्मन को देखेगा, वही पहले हमला करेगा।
पिछले कुछ वर्षों में यूक्रेन युद्ध, नागोर्नो-कराबाख संघर्ष और चीन की बढ़ती ड्रोन आधारित युद्ध तैयारी ने दुनिया भर की सेनाओं को एक कठोर सबक दिया है। टैंक अब केवल दूसरे टैंकों से नहीं हारते। वे उन दुश्मनों से हारते हैं जो पहाड़ियों, इमारतों, जंगलों या भूभाग की आड़ लेकर उन्हें पहले खोज लेते हैं।
भारत के लिए यह चुनौती और गंभीर है क्योंकि उसे दो बिल्कुल अलग युद्ध क्षेत्रों के लिए तैयार रहना पड़ता है। एक तरफ पूर्वी लद्दाख की ऊंची और कठिन पहाड़ियां हैं, दूसरी तरफ पश्चिमी रेगिस्तानी मोर्चा। ऐसे में भारतीय सेना की यह नई योजना केवल तकनीकी सुधार नहीं है। यह युद्धक्षेत्र में जानकारी हासिल करने की क्षमता को नीचे तक ले जाने की कोशिश है, ताकि हर टैंक अपने स्तर पर दुश्मन को खोज सके और हमला कर सके।
भारतीय टैंकों की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?
भारतीय सेना के पास बड़ी संख्या में T-72 अजेय और T-90 भीष्म टैंक हैं। अर्जुन Mk1A भी धीरे-धीरे सेना में शामिल हो रहा है। लेकिन इन सभी टैंकों की एक बुनियादी सीमा है। वे उतना ही देख सकते हैं जितना उनके कैमरे, तापीय दृष्टि प्रणाली और भूभाग उन्हें देखने दें।
युद्ध में यह सीमा बहुत खतरनाक हो सकती है। पूर्वी लद्दाख जैसे इलाकों में पहाड़ियां और घाटियां दृश्यता को बेहद सीमित बना देती हैं। पश्चिमी मोर्चे पर नहरें, गांव और छिपे हुए टैंक रोधी दस्ते खतरा पैदा कर सकते हैं। यदि दुश्मन आपको पहले देख ले और आप उसे न देख पाएं, तो भारी कवच भी ज्यादा मदद नहीं करता।
यूक्रेन युद्ध ने यही दिखाया। वहां कई टैंक सीधे टैंक युद्ध में नहीं, बल्कि छिपे हुए टैंक रोधी दस्तों और छोटे हमलावर ड्रोन की वजह से नष्ट हुए। इसका मतलब यह नहीं कि टैंक बेकार हो गए हैं। असली समस्या “अंधे टैंक” की है। यानी ऐसा टैंक जो युद्धक्षेत्र के ऊपर मौजूद जानकारी की परत से कटा हुआ हो।
भारतीय सेना अब इसी समस्या को हल करने की कोशिश कर रही है। यदि एक टैंक कमांडर सीधे अपने टैंक से छोटी घूमकर हमला करने वाली प्रणाली छोड़ सके, जो कुछ किलोमीटर आगे जाकर दुश्मन की स्थिति देख सके, तो पूरा युद्ध संतुलन बदल सकता है।
81mm प्रक्षेपक की सीमा ही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है
पहली नजर में 81mm धुआं ग्रेनेड प्रक्षेपक से ऐसी प्रणाली छोड़ना सीमित लगता है। इतनी छोटी जगह में बैटरी, कैमरा, संचार प्रणाली, उड़ान तंत्र और वारहेड को फिट करना आसान नहीं होगा। इसके अलावा प्रक्षेपण के समय प्रणाली को काफी झटका भी सहना पड़ेगा।
लेकिन भारतीय सेना का असली लक्ष्य सबसे बड़ी मारक क्षमता हासिल करना नहीं है। उसकी प्राथमिकता है बड़ी संख्या में तेजी से तैनाती।
यही इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है जिसे अधिकतर लोग नजरअंदाज कर रहे हैं। यदि सेना किसी अलग बड़े प्रक्षेपक प्रणाली को अपनाती, तो हर टैंक पर अलग बदलाव करना पड़ता। इसमें वर्षों लग सकते थे।
लेकिन 81mm प्रक्षेपक पहले से हजारों टैंकों पर मौजूद है। इसका मतलब है कि एक बार प्रणाली सफल हो जाए, तो उसे पूरे बेड़े में तेजी से लगाया जा सकता है। भारत के पास लगभग 3,700 टैंक हैं। यदि उनमें से बड़ी संख्या को अपनी हवाई निगरानी क्षमता मिल जाती है, तो युद्धक्षेत्र की पूरी तस्वीर बदल सकती है।
यानी यहां सीमा ही ताकत बन रही है। छोटी प्रणाली शायद कम दूरी तक जाए, लेकिन हजारों टैंकों को एक साथ देखने और हमला करने की क्षमता देना कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह केवल ड्रोन नहीं, युद्ध सोच का बदलाव है
भारतीय सेना की यह योजना असल में पुराने “टैंक केंद्रित युद्ध” से “जानकारी केंद्रित युद्ध” की तरफ बढ़ने का संकेत है। पहले टैंक केवल भारी मारक क्षमता वाला वाहन माना जाता था। अब वही टैंक जानकारी जुटाने वाला केंद्र भी बन सकता है।
आज युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण चीज केवल हथियार नहीं, बल्कि जानकारी है। कौन पहले दुश्मन की गतिविधि देखता है, कौन पहाड़ी के पीछे छिपे दस्ते को पहचानता है, कौन तोपखाने की स्थिति खोजता है, यही युद्ध का परिणाम तय कर सकता है।
यदि एक T-90 टैंक अपनी प्रणाली के जरिए किसी पहाड़ी के पीछे छिपी दुश्मन की स्थिति देख लेता है, तो वह जानकारी दूसरे टैंकों और तोपखाने तक पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि पूरा युद्धक्षेत्र एक जुड़ी हुई सूचना प्रणाली में बदल सकता है।
यही कारण है कि चीन की सेना पिछले कुछ वर्षों से ड्रोन आधारित युद्ध क्षमता पर भारी निवेश कर रही है। पाकिस्तान भी छोटे हमलावर ड्रोन और घूमकर हमला करने वाली प्रणालियों पर तेजी से काम कर रहा है।
भारत की सोच थोड़ी अलग है। वह अलग ड्रोन इकाइयों पर पूरी तरह निर्भर रहने की बजाय हर टैंक को सीमित लेकिन अपनी हवाई निगरानी क्षमता देना चाहता है। यह दिखने में साधारण लग सकता है, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह काफी प्रभावी तरीका हो सकता है।
लद्दाख में इसका असर सबसे ज्यादा क्यों दिख सकता है?
यदि इस क्षमता का सबसे बड़ा फायदा कहीं दिखाई देगा, तो वह पूर्वी लद्दाख होगा।
वहां भूभाग ही युद्ध को नियंत्रित करता है। कई बार दुश्मन कुछ सौ मीटर दूर होता है, लेकिन पहाड़ी की वजह से दिखाई नहीं देता। टैंक को आगे बढ़कर खुद को खतरे में डालना पड़ता है।
कल्पना कीजिए कि देपसांग या चुशुल जैसे इलाके में भारतीय टैंकों का एक दस्ता आगे बढ़ रहा है। सामने की पहाड़ी के पीछे चीन की सेना का टैंक रोधी दस्ता छिपा हो सकता है। सामान्य स्थिति में टैंक कमांडर को या तो पैदल गश्त भेजनी पड़ेगी या ऊपर से आने वाली ड्रोन जानकारी का इंतजार करना होगा।
लेकिन यदि वही टैंक अपनी छोटी निगरानी प्रणाली छोड़ दे, तो कुछ मिनटों में उसे पहाड़ी के पीछे की स्थिति दिखाई दे सकती है। इससे आगे बढ़ने, हमला करने या रास्ता बदलने का फैसला तुरंत लिया जा सकता है।
ऊंचाई वाले क्षेत्रों में समय सबसे महत्वपूर्ण चीज होता है। वहां रसद धीमी होती है, मौसम अचानक बदल सकता है और मदद पहुंचने में देर हो सकती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर निगरानी क्षमता बहुत बड़ा लाभ बन सकती है।
पश्चिमी मोर्चे पर इसका मतलब अलग होगा
पश्चिमी सीमा पर भूभाग खुला है, लेकिन खतरे फैले हुए हैं। पाकिस्तान ने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन और घूमकर हमला करने वाली प्रणालियों पर काफी ध्यान दिया है। भविष्य का युद्ध केवल टैंक बनाम टैंक तक सीमित नहीं रहेगा।
छिपे हुए टैंक रोधी दस्ते, छोटे हमलावर ड्रोन और तेजी से जगह बदलने वाली तोपें युद्धक्षेत्र को ज्यादा जटिल बना देंगी। ऐसे में केवल मोटा कवच पर्याप्त नहीं होगा।
यहीं यह नई प्रणाली उपयोगी हो सकती है। यह आगे बढ़ते टैंक दस्ते के सामने निगरानी कर सकती है, छिपी हुई दुश्मन स्थिति खोज सकती है और अचानक हमले की संभावना कम कर सकती है।
यह भारतीय सेना की नई “एकीकृत युद्ध समूह” अवधारणा के साथ भी मेल खाती है। इस अवधारणा का पूरा आधार तेज फैसले और लचीली कार्रवाई पर है। यदि हर टैंक के पास अपनी सीमित हवाई निगरानी क्षमता हो, तो छोटे स्तर पर तेज युद्ध संचालन ज्यादा संभव हो सकता है।
असली चुनौती तकनीक नहीं, भरोसेमंद क्षमता होगी
इस योजना का सबसे कठिन हिस्सा केवल उड़ने वाली प्रणाली बनाना नहीं है। असली चुनौती युद्ध जैसी परिस्थितियों में भरोसेमंद प्रदर्शन हासिल करना है।
81mm प्रक्षेपक से निकलने वाली प्रणाली को:
- तेज झटका सहना होगा
- कुछ सेकंड में स्थिर उड़ान पकड़नी होगी
- संचार स्थापित करना होगा
- दुश्मन की इलेक्ट्रॉनिक बाधाओं से बचना होगा
और यह सब अत्यधिक गर्मी और ठंड दोनों में करना होगा।
भारत की निजी रक्षा उद्योग क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन कई महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में अभी अनुभव सीमित है। यही कारण है कि इस योजना की सफलता केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगी। असली परीक्षा तब होगी जब सेना इसे बड़े पैमाने पर कठिन परिस्थितियों में इस्तेमाल करेगी।
फिर भी इस प्रयास का महत्व कम नहीं होता। यदि भारत इस प्रणाली को सफलतापूर्वक लागू कर देता है, तो वह दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है जिसने पुराने टैंक बेड़े को आधुनिक हवाई निगरानी नेटवर्क में बदल दिया।
भविष्य का भारतीय टैंक कैसा हो सकता है?
यदि यह योजना सफल होती है, तो 2030 तक भारतीय बख्तरबंद युद्ध सोच काफी बदल सकती है।
आज टैंक मुख्य रूप से एक भारी मारक वाहन है। भविष्य में वही:
- निगरानी केंद्र
- सूचना साझा करने वाला माध्यम
- सटीक हमला निर्देशित करने वाला मंच
भी बन सकता है।
कल्पना कीजिए कि एक टैंक द्वारा छोड़ी गई प्रणाली दुश्मन की तोपखाने की स्थिति खोजती है। वह जानकारी तुरंत दूसरे टैंकों और भारतीय तोपखाने तक पहुंच जाती है। यानी पूरा युद्धक्षेत्र जुड़ी हुई जानकारी के आधार पर काम करने लगता है।
भारत के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हर पुराने टैंक को बदलना आर्थिक रूप से संभव नहीं है। इसलिए मौजूदा टैंकों को अधिक “स्मार्ट” बनाना ज्यादा व्यवहारिक रास्ता बनता जा रहा है।
भारतीय सेना असल में क्या बनाने की कोशिश कर रही है?
भारतीय सेना केवल नई घूमकर हमला करने वाली प्रणाली नहीं बना रही। वह बख्तरबंद युद्ध की पूरी सोच बदलने की कोशिश कर रही है।
T-72, T-90 और अर्जुन जैसे टैंक आने वाले कई वर्षों तक भारत की सैन्य ताकत की रीढ़ बने रहेंगे। इसलिए सवाल यह नहीं है कि उन्हें हटाया कैसे जाए। असली सवाल यह है कि उन्हें ड्रोन आधारित आधुनिक युद्ध में प्रभावी कैसे रखा जाए।
81mm प्रक्षेपक आधारित यह योजना उसी सवाल का जवाब है।
यह प्रणाली शुरुआत में सीमित दूरी, सीमित उड़ान समय और कई तकनीकी चुनौतियों के साथ आएगी। लेकिन यदि भारत इसे सफलतापूर्वक विकसित कर लेता है, तो उसके टैंक पहले से कहीं ज्यादा जागरूक, लचीले और जीवित रहने में सक्षम बन सकते हैं।
और शायद यही इस पूरी योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। भारत अब केवल ज्यादा टैंक बनाने की नहीं सोच रहा। वह ज्यादा समझदार टैंक बनाने की तैयारी कर रहा है।

