आत्मनिर्भर भारत का दूसरा दशक और रक्षा उद्योग की वह खामोश परत जिसे दिल्ली अब भी ठीक से नहीं सुन रही
भारत में रक्षा आत्मनिर्भरता पर चर्चा का एक स्थायी ढाँचा बन चुका है। कैमरा हमेशा ऊपर की तरफ़ घूमता है। कौन-सी मिसाइल का परीक्षण हुआ। किस सरकारी रक्षा उपक्रम को कितना बड़ा ठेका मिला। कौन-सा लड़ाकू विमान उत्पादन में गया। कितना निर्यात हुआ। कितनी स्वदेशीकरण सूचियाँ जारी हुईं।
यह सब महत्वपूर्ण है। लेकिन भारत की रक्षा औद्योगिक संरचना की असली कहानी इन सुर्ख़ियों के नीचे चलती है।
वह कहानी उन हज़ारों छोटे और मध्यम उद्योगों की है जिनका नाम शायद ही कभी समाचारों में आता है। यही वे इकाइयाँ हैं जो किसी रडार के लिए वायरिंग तैयार करती हैं, किसी मिसाइल के लिए विशेष धातु फिटिंग बनाती हैं, किसी ड्रोन के लिए कार्बन ढाँचा ढालती हैं, किसी संचार प्रणाली के लिए रेडियो मॉड्यूल देती हैं। इनके बिना भारत का पूरा रक्षा उत्पादन तंत्र कुछ ही महीनों में रुक सकता है।
भारत के रक्षा विमर्श की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही है। देश अंतिम उत्पाद देखकर उत्साहित है। उस औद्योगिक जड़ को गंभीरता से नहीं देख रहा जिस पर पूरी सैन्य शक्ति टिकती है।
और यहाँ एक बात शुरू में ही स्पष्ट कर देना ज़रूरी है।
आधुनिक युद्ध में MSME परत केवल उत्पादन क्षमता नहीं होती। वह युद्धकालीन जीवित रहने की क्षमता होती है।
यह वह औद्योगिक परत है जो किसी संकट के 90वें, 200वें, या 400वें दिन तय करती है कि देश की उत्पादन मशीनरी अब भी चल रही है या नहीं। भारतीय व्यवस्था अभी भी इस परत को सहायक ठेकेदार की तरह देखती है। यही पूरा संकट है।
भारत अभी भी एक ख़रीदार-राज्य है, औद्योगिक-युद्ध राज्य नहीं
इस अंतर को समझना ज़रूरी है क्योंकि यहीं से बाक़ी सभी समस्याएँ निकलती हैं।
एक ख़रीदार-राज्य रक्षा उत्पादन को मुख्यतः ख़रीद-प्रक्रिया की नज़र से देखता है। कौन-सा मंच चाहिए। कितनी संख्या में चाहिए। कब चाहिए। किस कंपनी से चाहिए। उसकी पूरी ऊर्जा अनुबंध, निविदा, मूल्य और समय-सीमा के इर्द-गिर्द घूमती है।
एक औद्योगिक-युद्ध राज्य रक्षा उत्पादन को राष्ट्रीय शक्ति की मूल संरचना की तरह देखता है। उसके लिए सवाल यह नहीं होता कि अगला ऑर्डर कब मिलेगा। सवाल यह होता है कि यदि कल लंबा युद्ध शुरू हो जाए, तो उत्पादन की धारा लगातार कैसे चलती रहेगी। उसकी प्राथमिकता आपूर्ति श्रृंखला की गहराई, पुर्ज़ों की घरेलू उपलब्धता, युद्धकालीन उत्पादन विस्तार, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता, और औद्योगिक टिकाऊपन होती है।
भारत अभी पहले मॉडल पर खड़ा है। अमेरिका, चीन, इज़राइल और दक्षिण कोरिया दूसरे मॉडल पर हैं।
यह केवल प्रशासनिक अंतर नहीं है। यह पूरी रणनीतिक मानसिकता का अंतर है।
एक ख़रीदार-राज्य के लिए MSME वह ठेकेदार है जिसे कम लागत पर काम करना चाहिए। एक औद्योगिक-युद्ध राज्य के लिए MSME वह रणनीतिक संपत्ति है जिसे हर हाल में जीवित रखना ज़रूरी है, चाहे शांतिकाल में उसकी दक्षता थोड़ी कम क्यों न हो।
भारतीय रक्षा व्यवस्था अब भी पहली मानसिकता से संचालित होती है। और यही कारण है कि आत्मनिर्भर भारत का दूसरा दशक लगातार अपनी सीमाओं से टकरा रहा है।
एक गहरी संरचनात्मक धारणा जो अब टूट रही है
भारतीय रक्षा सोच की एक मूल मान्यता है जिसे दिल्ली ने कभी सार्वजनिक रूप से चुनौती नहीं दी।
वह मान्यता है कि भविष्य का युद्ध छोटा होगा। तीव्र होगा। राजनयिक हस्तक्षेप से जल्द ख़त्म होगा।
1965, 1971, 1999, सब इसी मॉडल पर लड़े गए। तीन से छह सप्ताह की लड़ाई। फिर युद्धविराम।
इसी मान्यता पर पूरी ख़रीद-संरचना खड़ी है। शांतिकालीन उत्पादन लय। सीमित गोला-बारूद भंडार। कम क्षरण की कल्पना। एक-दो बड़े सरकारी उपक्रम जो “ज़रूरत पड़ने पर” उत्पादन बढ़ा देंगे।
लेकिन यदि चीन के साथ संघर्ष हुआ, तो वह इस मॉडल में फ़िट नहीं बैठेगा।
ऐसा युद्ध मिसाइल-केंद्रित होगा। इलेक्ट्रॉनिक्स-केंद्रित होगा। लंबी अवधि का होगा। हर हफ़्ते सैकड़ों ड्रोन गिरेंगे, हज़ारों गोले खर्च होंगे। कोई एक मंच निर्णायक नहीं होगा। निर्णायक होगा वह देश जिसकी फ़ैक्ट्रियाँ दूसरे महीने, छठे महीने, बारहवें महीने भी उत्पादन कर सकें।
यूक्रेन युद्ध ने यह बात तीन साल में पूरी दुनिया को दिखा दी। रूस को पहले साल में बड़ी मुश्किल हुई क्योंकि उसका तोपख़ाना उत्पादन बड़े सरकारी उपक्रमों पर निर्भर था। दूसरे साल से उसने हज़ारों छोटी इकाइयों को सक्रिय किया। आज उसकी मासिक गोला-उत्पादन क्षमता पाँच गुना से अधिक है। यह वृद्धि बड़े उपक्रमों से नहीं आई। MSME-स्तर के फैले हुए उत्पादन जाल से आई।
यानी आधुनिक युद्ध की वास्तविकता एक तरफ़ है। भारतीय रक्षा ख़रीद-संरचना दूसरी तरफ़। यह दरार जितनी बड़ी होगी, संकटकाल में हम उतने ही असुरक्षित होंगे।
ऊपर से चमकदार, नीचे से नाज़ुक
पिछले दस वर्षों में भारत ने रक्षा उत्पादन में वास्तविक प्रगति की है। इसे केवल प्रचार कहकर ख़ारिज नहीं किया जा सकता।
रक्षा निर्यात 2017-18 के लगभग 4,682 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 15,916 करोड़ रुपये तक पहुँचा।
घरेलू रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 2023-24 में लगभग 22 प्रतिशत तक पहुँची।
4,666 रक्षा उपकरण और पुर्ज़े स्वदेशीकरण सूचियों में शामिल हुए। iDEX के तहत 619 स्टार्टअप और MSME जुड़े, 430 अनुबंध हुए।
लगभग 16,000 MSME रक्षा आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी बताई जाती हैं।
ऊपर से देखने पर यह उभरती हुई रक्षा अर्थव्यवस्था है।
पर वास्तविक प्रश्न कहीं अधिक गहरा है।
क्या भारत के पास वह औद्योगिक चौड़ाई है जो लंबे संकट में उत्पादन बनाए रख सके।
क्या इतने स्तरों वाली आपूर्ति श्रृंखला है कि किसी एक हिस्से के रुकने पर पूरा तंत्र बंद न हो। क्या छोटे उद्योग केवल पुर्ज़े बना रहे हैं, या वे रक्षा तकनीक की रीढ़ बन रहे हैं।
यहीं रक्षा विमर्श अधूरा रह जाता है। क्योंकि सुर्ख़ियों की वृद्धि और औद्योगिक टिकाऊपन दो अलग चीज़ें हैं।
एक उदाहरण से बात साफ़ होगी, और यह केवल तेजस का उदाहरण नहीं है।
मान लीजिए किसी संकट में सेना को अगले 18 महीनों के लिए हर महीने 30,000 अतिरिक्त 155 मिलीमीटर तोपख़ाना गोले चाहिए। अभी भारत की कुल मासिक उत्पादन क्षमता इसका एक अंश है। उसे तीन गुना करने के लिए कौन काम करेगा।
उत्तर है, सैकड़ों MSME जो विस्फोटक हिस्से, brass casings, fuze और propellant बनाती हैं। इनमें से अधिकांश पहले से ही भुगतान-देरी और एकमात्र खरीदार पर निर्भरता से जूझ रही हैं। उनसे एक रात में तीन गुना उत्पादन माँगना असंभव है।
यही स्थिति ड्रोन की पुनः-आपूर्ति की है। यदि किसी संकट में हर महीने 5,000 ड्रोन चाहिए, तो उनकी मोटर, बैटरी, नियंत्रक और कैमरे कहाँ से आएँगे। इनमें से अधिकांश आज भी आयातित हैं।
यही स्थिति युद्धभूमि की मरम्मत व्यवस्था की है। एक क्षतिग्रस्त बख़्तरबंद वाहन को 48 घंटे में युद्धभूमि पर लौटाने के लिए spare parts का जो फैला हुआ नेटवर्क चाहिए, वह आज भारत में नहीं है। है तो बिखरा हुआ है, और शांतिकालीन रसद के लिए बनाया गया है।
यानी समस्या केवल तेजस की नहीं है। यह संरचनात्मक है। भारत के लगभग हर रक्षा मंच की उत्पादन गति शांतिकाल की लय पर बँधी है। यही औद्योगिक गहराई की वास्तविक कमी है।
जोड़कर बनाने और वास्तविक आत्मनिर्भरता के बीच का अंतर
दिल्ली में आत्मनिर्भरता की भाषा कई बार इस भ्रम में फँस जाती है कि यदि अंतिम उत्पाद भारत में तैयार हो रहा है, तो वह स्वदेशी है।
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता कहीं अधिक गहरी चीज़ है।
क्या उसके सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़े भारत में बनते हैं। क्या उसकी चिप प्रणाली घरेलू है। क्या उसके सेंसरों के भीतर लगने वाले महत्वपूर्ण हिस्से स्थानीय हैं। क्या उसकी बैटरी तकनीक घरेलू है। क्या उसके विशेष धातु मिश्रण भारत में तैयार होते हैं।
यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है, तो स्वदेशीकरण सतही प्रदर्शन है, संरचनात्मक सच्चाई नहीं।
भारत आज भी अर्धचालक और सूक्ष्म इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के लिए भारी मात्रा में विदेशों पर निर्भर है। देश की 90 प्रतिशत से अधिक चिप आवश्यकता आयात पर आधारित है। 2023-24 में चीन से लगभग 12 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक आयात हुए। इनमें printed circuit boards और chipsets प्रमुख हैं।
यानी भारत कई बार ऐसे हथियार बना रहा है जिनका शरीर भारतीय है, लेकिन तंत्रिका तंत्र विदेशी।
यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह युद्धकालीन कमज़ोरी है।
आधुनिक युद्ध का स्वरूप अब पूरी तरह सॉफ़्टवेयर-संचालित हो चुका है। हर मिसाइल, हर ड्रोन, हर रडार, हर इलेक्ट्रॉनिक युद्ध-प्रणाली के भीतर सैकड़ों चिप और प्रोसेसर काम करते हैं।
एक guided missile में 200 से 800 चिप हो सकती हैं। यदि इनकी आपूर्ति रुक जाए, तो हथियार बेकार हो जाता है। कोई पारंपरिक धातु-शक्ति काम नहीं आती।
अब एक असुविधाजनक स्थिति की कल्पना कीजिए।
LAC पर तनाव बढ़ता है। चीन अघोषित रूप से इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़ों के निर्यात पर पाबंदी लगाता है। ताइवान क्षेत्र में संकट गहराता है। वैश्विक चिप आपूर्ति धीमी पड़ती है।
ऐसी स्थिति में भारतीय रक्षा MSME ढाँचे की उत्पादन क्षमता कितने महीनों में, कितने प्रतिशत तक गिरेगी।
इस प्रश्न का सार्वजनिक उत्तर कहीं मौजूद नहीं है। पर अनुमान बताते हैं कि तीन से छह महीने में उत्पादन का एक तिहाई से आधा हिस्सा प्रभावित हो सकता है।
यह आँकड़ा छाती ठोकने वाली भाषा के बीच एक असहज सच्चाई है। और जिस पाठक ने इलेक्ट्रॉनिक्स-केंद्रित युद्ध की ध्वनि सुनी है, वह इसका रणनीतिक भार समझ सकता है।
MSME तकनीक से पहले नकदी का युद्ध लड़ रहे हैं
रक्षा क्षेत्र में MSME चलाना सामान्य व्यापार नहीं है। यह कम मात्रा, उच्च प्रमाणन और लंबी प्रतीक्षा वाला उद्योग है।
पहले परीक्षण। फिर प्रमाणन। फिर सुरक्षा मंज़ूरी। फिर सीमित आदेश। फिर लंबा भुगतान चक्र।
भारत में अप्रैल 2024 से आयकर अधिनियम की धारा 43B(h) लागू हुई जिसके तहत MSME को 45 दिन में भुगतान अनिवार्य किया गया। काग़ज़ पर बड़ा सुधार था।
व्यवहार में स्थिति अब भी कठिन है।
मार्च 2024 तक देश भर में लगभग 7.34 लाख करोड़ रुपये के MSME चालान बकाया थे। व्यापारिक भुगतानों का 52 प्रतिशत से अधिक हिस्सा 90 दिन से ज़्यादा देर से चुकाया जाता है। रक्षा क्षेत्र में स्थिति और जटिल है क्योंकि यहाँ कच्चे माल की उपलब्धता भी एक बड़ी बाधा है।
एक छोटे उद्योग की स्थिति समझिए।
मान लीजिए पुणे की एक इकाई किसी रक्षा उपक्रम के लिए विशेष धातु फिटिंग बनाती है। हर महीने वेतन-बिल लगभग 18 लाख रुपये। बिजली, किराया, बैंक ऋण की किस्त मिलाकर अतिरिक्त 12 लाख। कुल स्थायी ख़र्च 30 लाख रुपये। कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता 30 से 45 दिन में भुगतान माँगते हैं। मुख्य ग्राहक 120 से 180 दिन में भुगतान करता है।
इस अंतर को भरने के लिए मालिक अपनी निजी बचत या ऊँचे ब्याज वाले ऋण का सहारा लेता है। अनौपचारिक बाज़ार में ब्याज दर 18 से 24 प्रतिशत तक चली जाती है।
यदि दो या तीन बड़े भुगतान लगातार अटक जाएँ, तो इकाई टूटने लगती है।
बड़ी कंपनियों के पास वित्तीय गहराई होती है। MSME के पास नहीं।
और इस नियम का एक अनपेक्षित दुष्प्रभाव सामने आ रहा है। 45 दिन वाले प्रावधान के बाद कई बड़ी कंपनियाँ अब MSME के रूप में पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से बचने लगी हैं। वे या तो ग़ैर-पंजीकृत आपूर्तिकर्ता खोजती हैं, या आपूर्तिकर्ता पर पंजीकरण रद्द कराने का दबाव डालती हैं।
नियम का उद्देश्य MSME को राहत देना था। व्यवहार में, कई इकाइयों ने ख़ुद को इस श्रेणी से बाहर कर लिया है ताकि उनके आदेश बने रहें।
नीति ऊपर से तय हुई। ज़मीन पर उसका तर्क उल्टा चला।
एकमात्र खरीदार की मंडी
भारतीय रक्षा उद्योग का एक और संकट है। एकमात्र खरीदार की संरचना।
रक्षा मंत्रालय और सशस्त्र बलों के अलावा बड़ा खरीदार लगभग नहीं है। सरकारी रक्षा उपक्रम बड़े समाकलक हैं। MSME सबसे नीचे की परत हैं।
इस व्यवस्था में छोटे उद्योगों के पास मोलभाव की शक्ति लगभग शून्य होती है। कीमत ऊपर तय। समय-सीमा ऊपर तय। डिज़ाइन ऊपर तय। और यदि कोई परियोजना रुक जाए, तो पूरा जोखिम नीचे गिरता है।
यही कारण है कि कई अनुभवी MSME उद्यमी जानबूझकर रक्षा क्षेत्र में सीमित निवेश रखते हैं। वे अपनी कुल आय का 30 प्रतिशत से अधिक रक्षा उत्पादन से नहीं जोड़ते। यह उनके लिए जीवित रहने की रणनीति है।
लेकिन इसका दूसरा अर्थ यह है कि भारत का रक्षा MSME ढाँचा अब भी अंशकालिक है। पूर्णकालिक नहीं।
और जब तक छोटे उद्योग पूरी क्षमता के साथ रक्षा उत्पादन में नहीं उतरेंगे, तब तक औद्योगिक गहराई नहीं बनेगी।
चीन ने यह खेल अलग सभ्यता के स्तर पर खेला
भारत और चीन के बीच सबसे बड़ा अंतर सैन्य बजट का नहीं है। औद्योगिक दर्शन का है।
चीनी रक्षा-औद्योगिक संरचना तीन ऐतिहासिक परतों में बनी है। तीनों समझे बिना उसकी आज की ताक़त समझ नहीं आती।
पहली परत 1960 के दशक में बनी।
माओ ने “तीसरे मोर्चे” की रणनीति शुरू की। तटीय शहरों पर अमेरिकी या सोवियत हमले के डर से रक्षा उत्पादन को मध्य और पश्चिमी चीन के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में फैलाया गया। हज़ारों फ़ैक्ट्रियाँ भीतर बसाई गईं। यह युद्धकाल में बिखरे हुए उत्पादन का पहला सैद्धांतिक प्रयोग था। आर्थिक रूप से अकुशल, पर रणनीतिक रूप से क्रांतिकारी।
दूसरी परत 1980 और 90 के दशक में बनी।
देंग शियाओपिंग के सुधारों के साथ “गाँव-कस्बा उद्यम” (township and village enterprises) उभरे। ये गाँव-कस्बों के स्तर पर लाखों छोटी इकाइयाँ थीं। शुरू में कृषि और हल्के उद्योग में। धीरे-धीरे सूक्ष्म इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, पुर्ज़ा निर्माण में। 1990 के दशक के अंत तक चीन के पास लाखों ऐसी इकाइयाँ थीं जो किसी न किसी रूप से बड़े उद्योगों की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ चुकी थीं। यह नीचे से ऊपर की ओर बनी हुई जैविक औद्योगिक गहराई थी जिसे राज्य ने सक्रिय रूप से बड़े उत्पादन ढाँचे से जोड़ा।
तीसरी परत 2015 के बाद बनी।
शी जिनपिंग ने “नागरिक-सैन्य संलयन” (military-civil fusion) को औपचारिक राष्ट्रीय सिद्धांत का रूप दिया। नागरिक और सैन्य उत्पादन के बीच कोई दीवार नहीं होनी चाहिए। एक कंपनी जो नागरिक ड्रोन बनाती है, वह संकटकाल में सैन्य ड्रोन उत्पादन में बदले। एक चिप-फ़ैक्ट्री जो mobile फ़ोन के लिए चिप बनाती है, वह रडार-निर्देशन के लिए चिप बनाने में दो सप्ताह में बदल जाए। यह केवल नीति नहीं है। यह सरकारी निवेश, अनुसंधान कोष, और ख़रीद-अनुबंधों के माध्यम से सक्रिय रूप से बनाई गई संरचना है।
तीनों परतें मिलकर आज चीन की वास्तविक रक्षा शक्ति बनाती हैं।
उसके पास भौगोलिक फैलाव है। उसके पास छोटे उद्योगों की घनी परत है। उसके पास नागरिक से सैन्य उत्पादन में पलटने की क्षमता है। उसके पास इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण का ऐसा पैमाना है जो भारत से दस गुना से ज़्यादा है।
यानी चीन की रक्षा शक्ति की असली नींव उसकी सेना में नहीं, उसके MSME-तुल्य ढाँचे में है।
भारत ने यह सबक अभी पूरी तरह नहीं सीखा। हमारी रक्षा MSME नीति अब भी एक अलग क्षेत्र की तरह चलती है। हमारे पास नागरिक-सैन्य संलयन का कोई औपचारिक सैद्धांतिक ढाँचा नहीं है। हमारे पास युद्धकाल में बिखरे हुए उत्पादन की कोई राष्ट्रीय योजना नहीं है।
यह अंतर पैमाने का नहीं है। यह दार्शनिक है।
चीन रक्षा उत्पादन को सभ्यता के स्तर पर देखता है। भारत इसे अभी भी एक मंत्रालय की ज़िम्मेदारी की तरह।
इतिहास इसकी पुष्टि करता है
यह कोई नया विचार नहीं है। बीसवीं सदी के लगभग हर बड़े युद्ध ने यही सिखाया है।
द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी की हार का एक बड़ा कारण उसकी संकेंद्रित औद्योगिक संरचना थी। बड़ी फ़ैक्ट्रियाँ, छोटी आपूर्ति परत। जब मित्र-राष्ट्रों की बमबारी ने Ruhr और Essen की फ़ैक्ट्रियाँ नष्ट कीं, तो जर्मनी के पास तेज़ी से उत्पादन पुनर्जीवित करने की क्षमता नहीं थी।
इसके विपरीत सोवियत संघ ने 1941 में अपनी पूरी औद्योगिक मशीनरी को Urals और Siberia की ओर खाली कराया। कई महीनों में 1,500 से अधिक फ़ैक्ट्रियाँ। यह बिखराव-आधारित औद्योगिक टिकाऊपन थी, जिसने रूस को टैंक और विमान बनाने की क्षमता दी जब जर्मनी के पास उत्पादन के साधन घटते जा रहे थे।
अमेरिका की “लोकतंत्र का शस्त्रागार” इसी विचार का दूसरा रूप थी। Detroit के मोटरगाड़ी कारख़ाने रातोंरात लड़ाकू विमान और टैंक बनाने लगे। यह संभव इसलिए हुआ क्योंकि अमेरिका की नागरिक उत्पादन परत में पहले से ही दोहरे-उपयोग की क्षमता थी।
तीनों उदाहरण एक ही बात कहते हैं। युद्ध कारख़ानों में जीते जाते हैं, मंचों पर नहीं। और कारख़ानों का मतलब है हज़ारों छोटी इकाइयाँ जो किसी एक हमले या व्यवधान से नष्ट नहीं हो सकतीं।
भारत आज एक ऐसी रक्षा अर्थव्यवस्था बना रहा है जिसकी संरचना द्वितीय युद्ध के जर्मनी से ज़्यादा मिलती है, और सोवियत संघ या अमेरिका से कम।
यह तुलना असहज है। पर यही ईमानदार तुलना है।
नवाचार है, टिकाऊपन नहीं
iDEX और TDF जैसी योजनाओं ने पिछले पाँच साल में नवाचार के स्तर पर ऊर्जा पैदा की है।
ड्रोन। घूम-घूम कर हमला करने वाले हथियार। स्वायत्त प्रणालियाँ। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्धक्षेत्र उपकरण। सुरक्षित संचार। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के पुर्ज़े। इन क्षेत्रों में नई भारतीय कंपनियाँ उभरी हैं। ADITI योजना के तहत एक परियोजना पर 25 करोड़ रुपये तक का अनुदान मिल सकता है।
पर रक्षा नवाचार केवल प्रोटोटाइप संस्कृति से नहीं टिकता।
उसके लिए ख़रीद की निरंतरता चाहिए। पैमाने की दृश्यता चाहिए। परीक्षण-सहायता चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण, भरोसेमंद आय का ढाँचा चाहिए।
भारत में कई कंपनियाँ प्रोटोटाइप से उत्पादन तक पहुँचने में अटक जाती हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि तकनीक काम नहीं करती। ऐसा इसलिए कि एक नई तकनीक को क्षेत्र-परीक्षण से सेना की गुणवत्ता-शर्तों के अनुरूप ढालने और फिर बड़े ऑर्डर तक पहुँचने में पाँच से सात साल लग सकते हैं।
इस अंतराल में पूँजी ख़त्म होती है। इंजीनियर दूसरी नौकरियों में जाते हैं। संस्थापक नागरिक बाज़ार की ओर मुड़ते हैं।
नवाचार की घोषणा आसान है। उसे टिकाऊ बनाना कठिन है।
DRDO ने 2025 में तकनीक-हस्तांतरण नीति में संशोधन किया। MSME को मूल तकनीकों पर 50 प्रतिशत शुल्क छूट। सही दिशा है। पर तकनीक हस्तांतरण एक प्रक्रिया है, दस्तावेज़ नहीं। उस डिज़ाइन को उत्पादन-योग्य बनाने में जो इंजीनियरिंग क्षमता चाहिए, वह अधिकांश MSME के पास नहीं है।
अमेरिका में रक्षा विभाग अपने आपूर्तिकर्ता-आधार को सीधे तकनीकी सहायता देता है। इज़राइल में बड़ी कंपनियाँ अपने नीचे की परत के आपूर्तिकर्ताओं के साथ कारख़ाने-स्तर पर इंजीनियरिंग साझेदारी बनाती हैं। भारत में यह संस्कृति अभी विकसित नहीं हुई है।
रक्षा गलियारों की वास्तविक परीक्षा अभी बाक़ी है
उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु रक्षा गलियारों को लेकर बहुत प्रचार हुआ।
उत्तर प्रदेश गलियारे में 170 समझौता-ज्ञापन। 57 कंपनियों को छह केंद्रों में ज़मीन। लगभग 13,000 प्रत्यक्ष नौकरियाँ। झाँसी केंद्र पर 9,139 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव।
तमिलनाडु गलियारे में 40 उद्योगों के साथ समझौता। 11,153 करोड़ रुपये का संभावित निवेश। पर ज़मीनी प्रगति केंद्र-राज्य संबंधों से प्रभावित।
गलियारों की सफलता समझौतों की संख्या से तय नहीं होगी।
वास्तविक प्रश्न ये हैं। क्या वहाँ आपूर्तिकर्ताओं के समूह बन रहे हैं। क्या परीक्षण सुविधाएँ सबकी पहुँच में हैं। क्या कुशल श्रमिकों की पाइपलाइन बन रही है। क्या स्थानीय उद्योग आपस में जुड़ रहे हैं। क्या MSME उप-प्रणाली स्तर का स्वामित्व हासिल कर रही हैं।
यदि गलियारे केवल भूमि आवंटन और निवेश घोषणाओं तक सीमित रह गए, तो भारत रणनीतिक उत्पादन सभ्यता नहीं बना पाएगा।
यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात। गलियारों में आने वाली अधिकांश MSME वे हैं जो पहले से ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग या एयरोस्पेस में काम कर रही थीं। शुद्ध रूप से रक्षा-केवल स्टार्टअप कम हैं। यानी गलियारे एक मौजूदा ढाँचे को आकर्षित कर रहे हैं, नया बना नहीं रहे। आकर्षित इकाइयाँ बाज़ार परिस्थितियाँ बदलते ही वापस अपने मूल क्षेत्र में लौट सकती हैं।
रक्षा उद्योग सभ्यता की तरह बनता है। केवल परियोजना की तरह नहीं।
MSME बोझ नहीं, रणनीतिक दोहरी सुरक्षा हैं
यह पूरे लेख का केंद्रीय तर्क है।
आधुनिक युद्ध में अतिरिक्तता कमज़ोरी नहीं होती। वह जीवित रहने की शर्त होती है।
यदि एक कारख़ाना नष्ट हो जाए, तो दूसरा उत्पादन जारी रखे। यदि एक आपूर्तिकर्ता रुक जाए, तो दूसरा तुरंत सक्रिय हो जाए। यदि एक पुर्ज़े की आपूर्ति टूटे, तो उसका विकल्प उपलब्ध हो।
यह क्षमता केवल बड़े सरकारी उपक्रमों से नहीं आती। यह हज़ारों छोटे उद्योगों के फैले हुए जाल से आती है।
यदि भारत का MSME आधार सिकुड़ता रहा, तो इसके तीन गंभीर रणनीतिक परिणाम होंगे।
पहला, नवाचार केंद्रित हो जाएगा। कम कंपनियाँ, कम विचार, कम प्रतिस्पर्धा। बड़े खिलाड़ी जो तकनीक की दिशा भारत के लिए तय करेंगे, वही दिशा बनेगी। विकल्प संकुचित होंगे।
दूसरा, मूल्य-निर्धारण की शक्ति केंद्रित हो जाएगी। सरकार के पास सौदेबाज़ी की क्षमता घटेगी क्योंकि उसके पास विकल्प कम होंगे। यह दीर्घकालीन रूप से रक्षा ख़र्च बढ़ाता है।
तीसरा, युद्धकाल में बदलाव की गति धीमी होगी। बड़ी कंपनियाँ धीरे बदलती हैं। छोटी फुर्ती से। यदि चीनी जैमिंग ने भारतीय ड्रोन की फ़्रीक्वेंसी को बेकार कर दिया, तो बदलाव की गति किस पर निर्भर करेगी। एक बड़े सरकारी उपक्रम की प्रक्रिया-प्रबंधन व्यवस्था पर, या सौ छोटी कंपनियों की समानांतर प्रयोगशीलता पर। उत्तर स्पष्ट है।
यही कारण है कि औद्योगिक चौड़ाई केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है। यह युद्ध-दर्शन का प्रश्न है।
यहाँ एक अनसुलझा रणनीतिक प्रश्न उठता है। यदि कल LAC पर 18 महीने का संघर्ष शुरू हो, तो भारत के कितने रक्षा MSME छह महीने बाद भी सामान्य उत्पादन कर पाएँगे। कितने तीन महीने में नकदी संकट में आ जाएँगे। और संकट के अंत तक कितने जीवित बचेंगे।
इस प्रश्न का उत्तर सरकार के पास होना चाहिए। सार्वजनिक रूप से नहीं, पर आंतरिक रूप से। यदि यह उत्तर मौजूद नहीं है, तो आत्मनिर्भर भारत एक नीतिगत नारा है, सैद्धांतिक वास्तविकता नहीं।
निर्यात के आँकड़े, जो आधी कहानी कहते हैं
रक्षा निर्यात 2017-18 के 4,682 करोड़ रुपये से 2022-23 के 15,916 करोड़ रुपये तक पहुँचा। यह आँकड़ा बार-बार उद्धृत होता है।
यह सही है। पर पूरी कहानी नहीं।
भारत का अधिकांश रक्षा निर्यात गोला-बारूद, सुरक्षात्मक कवच, सामान्य इलेक्ट्रॉनिक्स, और पुर्ज़ों का है। उच्च-स्तरीय मंचों का निर्यात कम है। और जब है भी, तो वह सरकारी-स्तर के रणनीतिक समझौतों के तहत है। ब्रह्मोस का इंडोनेशिया को 3,800 करोड़ रुपये का सौदा पूरी तरह सरकारी ढाँचे में हुआ। एक नीचे की परत का आपूर्तिकर्ता जो उस श्रृंखला का हिस्सा है, उसे प्रत्यक्ष निर्यात लाभ बहुत कम मिलता है।
निर्यात की कहानी अभी सरकारी उपक्रम-केंद्रित है। MSME इस ढाँचे में प्रवेश-स्तर की आपूर्तिकर्ता की तरह काम कर रही हैं, बराबर के साझेदार की तरह नहीं।
रक्षा निर्यात के 50,000 करोड़ रुपये के 2029 तक के लक्ष्य का असली मतलब यही है। यदि यह लक्ष्य पाँच-छह बड़े सरकारी उपक्रमों के अनुबंधों से हासिल हुआ, तो कहानी अधूरी रहेगी। यदि यह सैकड़ों MSME के उप-प्रणाली स्तर के निर्यात से हुआ, तो भारत वास्तव में रक्षा-औद्योगिक शक्ति बनेगा।
कौन उभर रहा है, कौन डूब रहा है
अगले पाँच साल में रक्षा MSME ढाँचे में एक स्पष्ट विभाजन होगा।
उभरने वाली इकाइयाँ वही होंगी जो तीन में से कम-से-कम दो आधार पकड़ पाएँगी। पहली, ऐसी विशिष्ट क्षमता जिसका घरेलू विकल्प कम है। दूसरी, नागरिक और सैन्य दोनों बाज़ारों के लिए उपयोगी उत्पाद। तीसरी, निर्यात की तत्परता जो उन्हें एकमात्र खरीदार पर निर्भरता से बचाए।
ड्रोन के पुर्ज़े, ड्रोन-रोधी प्रणालियाँ, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध की उप-इकाइयाँ, सुरक्षित संचार के मॉड्यूल, विशेष मिश्रित सामग्री। इन क्षेत्रों में काम कर रही MSME के पास खुली खिड़कियाँ हैं।
डूबने वाली इकाइयाँ वे होंगी जो सामान्य धातु-कटाई या आम कार्यगत निर्माण में अटकी हैं, एक ही सरकारी उपक्रम पर निर्भर हैं, और भुगतान-देरी के चक्र में फँसी हैं। ये अक्सर एक या दो पीढ़ी पुरानी पारिवारिक इकाइयाँ हैं, जिन्होंने 1990 के दशक में किसी सरकारी उपक्रम के साथ रिश्ता बनाया था। अब वह रिश्ता उन्हें न पैमाना दे रहा है, न निकलने का रास्ता।
यहाँ एक रणनीतिक प्रश्न है। एक हज़ार बड़ी MSME वाला देश ज़्यादा टिकाऊ है, या दस हज़ार छोटी वाला। पहला मॉडल दक्षता का है, दूसरा जीवित रहने का। शांतिकाल पहले की ओर खींचता है। युद्धकाल दूसरे की माँग करता है।
भारत का संस्थागत झुकाव अभी पहले की ओर है। यह झुकाव युद्धकाल में महँगा साबित हो सकता है।
तीसरे दशक की क़ीमत, दूसरे दशक की चुप्पी से तय होगी
आत्मनिर्भर भारत का पहला दशक एक राजनीतिक कथा था।
दूसरा दशक संरचनात्मक परीक्षा है।
पहले दशक में स्वदेशीकरण सूचियाँ बनीं, रक्षा गलियारे घोषित हुए, विदेशी निवेश की सीमा बढ़ी, iDEX शुरू हुआ। ये सही कदम थे। पर अब प्रश्न नीति का नहीं, क्रियान्वयन का है।
MSME ढाँचे को पैमाने पर पहुँचने के लिए तीन चीज़ें चाहिए जो अभी अधूरी हैं। पहली, भुगतान-चक्र की ऐसी व्यवस्था जो उसे नकदी-विहीन न रखे। दूसरी, भरोसेमंद ऑर्डर-पुस्तिका जो अगले तीन से पाँच साल की दृश्यता दे। तीसरी, बड़े समाकलक और MSME के बीच एक तकनीकी साझेदारी संस्कृति, जिसमें MSME केवल आपूर्तिकर्ता न हो, बल्कि सह-विकासकर्ता मानी जाए।
ये तीनों चीज़ें नीति से ज़्यादा संस्थागत संस्कृति की समस्या हैं। और संस्कृति बदलने में कोई योजना काम नहीं आती। आती है तो लगातार का दबाव, पारदर्शी जवाबदेही, और एक ऐसा रक्षा नेतृत्व जो नीचे की परत के आपूर्तिकर्ता की चुप्पी को उतनी ही गंभीरता से सुने जितनी HAL के अध्यक्ष की प्रस्तुति को।
प्रश्न यह नहीं है कि भारत 2032 तक 50,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात कर पाएगा या नहीं। प्रश्न यह है कि उस आँकड़े के पीछे कौन-सी इकाइयाँ खड़ी होंगी।
यदि वही पुराने पाँच-सात सरकारी उपक्रम और दो-तीन बड़े निजी खिलाड़ी, तो आत्मनिर्भरता का मतलब केवल आयात-प्रतिस्थापन होगा। यदि उनके पीछे एक हज़ार जीवित, मुनाफ़े वाली, तकनीकी रूप से सक्षम छोटी और मध्यम इकाइयाँ खड़ी होंगी, तो उस आँकड़े का रणनीतिक भार बिल्कुल अलग होगा।
मिसाइलें बड़े मंचों पर दिखाई देती हैं। पर उन्हें जीवित रखने वाली औद्योगिक नसें अक्सर छोटे कारख़ानों में धड़कती हैं।
भारत आज मिसाइलें बना रहा है। पर असली प्रश्न यह है कि क्या वह उन कारख़ानों को भी जीवित रख पा रहा है जो युद्ध के दूसरे वर्ष में मिसाइलें बनाते रहेंगे।
यदि किसी देश की रक्षा अर्थव्यवस्था शांतिकाल में ही नकदी की कमी से जूझ रही हो, तो युद्धकाल में उसकी सहनशीलता कितनी वास्तविक होगी।
यह प्रश्न दिल्ली ने अब तक ख़ुद से नहीं पूछा है।
और जब तक यह प्रश्न नहीं पूछा जाता, आत्मनिर्भर भारत का तीसरा दशक दूसरे दशक की उसी चुप्पी की क़ीमत चुकाता रहेगा।

