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भविष्य का युद्धरक्षा बजट

भारत का रक्षा बजट: एक देश, जो एक साथ दो सेनाएं चला रहा है

भारत का रक्षा बजट रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह पैसा भविष्य की युद्ध क्षमता बना रहा है या पुरानी सैन्य संरचना को बचाने में खर्च हो रहा है। पेंशन, अग्निपथ, ड्रोन युद्ध, चीन के सैन्य सुधार और 2040 के युद्धक्षेत्र के संदर्भ में यह विश्लेषण भारत की रक्षा व्यवस्था के गहरे संरचनात्मक संकट को समझने की कोशिश करता है।

रक्षा विमर्श Logo
Last updated: May 30, 2026 8:20 am
रक्षा विमर्श विश्लेषण टीम
7 days ago
भारत का रक्षा बजट
भारत 2040 का युद्ध लड़ना चाहता है। लेकिन उसका बजट अब भी 1995 की सेना पर खर्च हो रहा है
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भारतीय रक्षा बजट पर हर साल वही बहस होती है।

आंकड़ा बड़ा है या छोटा। GDP का कितना हिस्सा है। चीन से कितना कम है। कौन सा सौदा हुआ। कौन सा अटका।

इन सब के बीच एक सवाल नहीं पूछा जाता।

भारत वास्तव में कौन सी सेना का बजट चला रहा है? वह जो आज है, या वह जो 2040 में होनी चाहिए?

ये दो अलग-अलग सेनाएं हैं।

पहली है 13 लाख सक्रिय सैनिकों की एक बहुत बड़ी सेना। उसकी जड़ें अंग्रेज़ों के ज़माने की पैदल टुकड़ियों में हैं। उसका आज का रूप 1947 के बाद के बड़े युद्धों से ढला है। यह सेना मनुष्य पर टिकी है। उसकी संख्या पर, उसके अनुभव पर, उसकी सहनशीलता पर।

दूसरी वह सेना है जो दुनिया में बन रही है।

आसमान-समुद्र-ज़मीन को जोड़ने वाले sensor। AI से चलने वाले फ़ैसले। अपने आप हमला करने वाले drone। software से लड़ा जाने वाला युद्ध। अंतरिक्ष से निगरानी। electromagnetic spectrum पर कब्ज़ा।

इस सेना का तर्क सैनिकों की संख्या नहीं है। मशीनों का घनत्व है। उसकी सबसे बड़ी ज़रूरत सैनिक नहीं, इंजीनियर है। उसका सबसे बड़ा ख़र्च वेतन नहीं, semiconductor है।

भारत आज इन दोनों सेनाओं को एक ही बजट से चलाने की कोशिश कर रहा है।

एक 20वीं सदी की है, दूसरी 21वीं की। एक को आदमी खिलाता है, दूसरी को मशीन। एक को पेंशन चाहिए, दूसरी को अनुसंधान।

असली समस्या यह नहीं कि बजट छोटा है। समस्या यह है कि वह बजट एक साथ दो अलग-अलग युगों को चलाने में लगा है। और इस कोशिश में दोनों युगों की तैयारी अधूरी रह जाती है।

पेंशन का बढ़ता बिल इसकी निशानी है। बीमारी नहीं।

रक्षा बजट 2025-26: वह हिसाब, जो सरकारी भाषा छुपा लेती है

2025-26 का कुल रक्षा बजट लगभग 6.81 लाख करोड़ रुपये है।

पहली नज़र में बहुत बड़ा। अंदर जाइए, तस्वीर बदल जाती है।

पेंशन पर 1.60 लाख करोड़ से ऊपर। वेतन, ईंधन, राशन, मरम्मत, और रोज़ के काम पर लगभग 2.80 लाख करोड़। नई चीज़ें खरीदने के लिए बचा 1.80 लाख करोड़।

इसमें भी 70 से 80 प्रतिशत पुराने सौदों की किस्तों में चला जाता है। राफेल, S-400, P-8I, अपाचे, चिनूक। इन सबकी किस्तें अभी चल रही हैं।

जो नया खरीदने के लिए असली रकम बचती है, वह 40 से 50 हज़ार करोड़ के आसपास होती है।

6.81 लाख करोड़ की चमकदार सुर्ख़ी। नया कुछ खरीदने की असली ताक़त उसका 7 प्रतिशत से भी कम।

पर सवाल यह आंकड़ा भी नहीं है। सवाल यह है कि वह 50 हज़ार करोड़ किस सेना को बनाने में जा रहा है।

अगर वह 1995 की सेना को 2025 में बनाए रखने में लग रहा है, तो उसका दूरगामी मूल्य लगभग शून्य है।

यहीं असली त्रासदी है। जो रकम बच भी रही है, वह ज़्यादातर पुरानी सेना के थोड़े-बहुत upgrade पर जा रही है। नया जहाज़, नया टैंक, नई तोप। वही पुरानी श्रेणियाँ, वही पुरानी सोच, बस थोड़ी बेहतर तकनीक के साथ।

यह बदलाव नहीं है। यह बस replacement है।

असली बदलाव का मतलब होगा doctrine, force structure, और क्षमता-portfolio की मूल नई व्यवस्था। वह बजट में दिख नहीं रही।

पेंशन की बहस, जो दरअसल पेंशन की नहीं है

रक्षा पेंशन पर बात अक्सर पेंशनभोगियों पर आकर रुक जाती है। यह ग़लत framing है।

समस्या लोगों की नहीं है।

अगर आप 13 लाख सक्रिय और 25 लाख सेवानिवृत्त सैनिकों की सेना चलाते हैं, तो उसकी पेंशन का हिसाब वही होगा जो आज है। पेंशनभोगियों को दोष देने का कोई तर्क नहीं। उनसे वादा एक राज्य ने किया था। उसे निभाना उसकी ज़िम्मेदारी है।

सवाल यह है कि इतनी बड़ी सेना का तर्क क्या है। 38 लाख वर्दीधारी लोगों वाली एक प्रणाली क्यों?

इसका जवाब doctrine में है।

भारतीय सैन्य doctrine पिछले सात दशकों से एक मूल बात पर टिकी है। एक बहुत बड़ी standing army, जो दो सीमाओं पर एक साथ चल सके। यह doctrine 1947 के बंटवारे, 1962 की हार, और 1971 की जीत से धीरे-धीरे बनी। हर युद्ध ने इसे और मज़बूत किया।

यह doctrine अपने ज़माने में सही थी।

एक ऐसा ज़माना जब युद्ध मुख्यतः manpower और थका देने वाली लड़ाई पर चलता था। जब निगरानी सीमित थी। जब सटीक हमले अपवाद थे। जब फ़ैसले के चक्र घंटों और दिनों में मापे जाते थे।

उस ज़माने की सेना बड़ी होनी ही थी। लेकिन वह ज़माना बीत चुका है।

2022-24 के यूक्रेन-रूस युद्ध ने यह साफ़ दिखा दिया। एक 800 डॉलर का drone एक 4 करोड़ डॉलर का टैंक उड़ा सकता है। पुरानी सेनाओं की बड़ी formations, जो पहले निर्णायक हथियार थीं, अब target की तरह दिखती हैं। निगरानी की भीड़ ने युद्धक्षेत्र को पारदर्शी बना दिया है। उसमें छिपना मुश्किल है। चलना ख़तरनाक।

ऐसे ज़माने में 38 लाख वर्दीधारी लोगों की सेना का तर्क क्या है?

यह सवाल पेंशन के बिल से कहीं ज़्यादा गहरा है।

पेंशन उस तर्क का आर्थिक नतीजा है। तर्क बदले, तो नतीजा भी बदलेगा। तर्क न बदले, तो पेंशन का बोझ हर वेतन आयोग के साथ बढ़ता ही जाएगा।

अग्निपथ योजना का असली मतलब, जो राजनीतिक धूल में दब गया

2022 में अग्निपथ की घोषणा हुई।

बहस तुरंत “नौजवानों के साथ अन्याय” के साँचे में चली गई। प्रदर्शन हुए। मीडिया का ध्यान पेंशन से अग्निवीर पर चला गया।

इस सारी धूल में जो खो गया, वह अग्निपथ का असली मतलब था।

अग्निपथ सिर्फ़ भर्ती में बदलाव नहीं है। यह एक राज्य का इशारा है कि मौजूदा force model आर्थिक रूप से चल नहीं सकता। और doctrinal रूप से पुराना पड़ चुका है।

यह स्वीकारोक्ति इतनी असुविधाजनक है कि उसे सीधे कभी नहीं कहा गया। उसे एक नई scheme के पीछे ढक दिया गया।

अग्निपथ का पहला मक़सद यह है कि लंबे अरसे में पेंशन वाले सैनिकों की पाइपलाइन छोटी हो। अगले बीस-तीस साल में इसका असर दिखेगा।

लेकिन इसका दूसरा मक़सद ज़्यादा गहरा है। चार साल की rotational सेवा का मतलब यह है कि सेना का साँचा बदल रहा है। एक “career force” से एक छोटी-सेवा वाले मॉडल की तरफ़ धीमी यात्रा। इज़राइल, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, स्विट्ज़रलैंड, सब किसी न किसी रूप में इसी तर्क पर चलते हैं।

समस्या यह है कि भारत में अग्निपथ को doctrine के तर्क से नहीं, पैसे की मजबूरी से लागू किया गया।

पहले आर्थिक ज़रूरत आई। फिर उसके आसपास तर्क बुने गए। बड़ा doctrinal framework, जिसमें force structure, training, equipment, deployment, और reserve organisation सब एक साथ बदले, वह अभी कहीं नहीं है।

यह वैसा ही है जैसे कोई आदमी घर के एक कमरे की मरम्मत करवा ले, बाक़ी पूरे घर की नींव को छुए बिना। नया कमरा अच्छा दिखेगा। पुरानी दीवारें वहीं रहेंगी।

Drone युद्ध और missile का नया गणित, जो हर पुराने तर्क को पलट देता है

एक armoured division को maintain करने का सालाना ख़र्च हज़ारों करोड़ रुपयों में है।

एक टैंक की लागत 30 से 50 करोड़। उसका पूरे जीवन का ख़र्च 100 से 150 करोड़। एक armoured division में 250 से ऊपर टैंक। साथ में लगभग 15 हज़ार सैनिक।

अब इसके सामने एक loitering munition का गणित देखें।

Shahed-136, जो रूस ने ईरान से लिया, की कीमत 20 से 50 हज़ार डॉलर के बीच बताई जाती है। यानी 15 से 40 लाख रुपये।

एक Shahed एक टैंक उड़ा सकता है। मतलब 30 लाख रुपये का हथियार 40 करोड़ रुपये के टैंक को मार रहा है।

अनुपात लगभग 1 का 130।

अब इसमें पैमाना जोड़ें। एक हज़ार Shahed एक साथ छोड़ने का कुल ख़र्च लगभग 300 करोड़। एक armoured division की कुल लागत लगभग 30 हज़ार करोड़।

यानी एक हज़ार drones की एक लहर 100 गुना बड़ी ताक़त को threat में डाल सकती है।

यह सिर्फ़ हिसाब नहीं है। यह आधुनिक युद्ध की पूरी नींव है।

अमेरिका के Replicator initiative के तहत पहले बैच में हज़ारों autonomous systems तैनात करने की योजना है। चीन drone और unmanned underwater vehicles में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। तुर्की ने Bayraktar series से अपनी defence diplomacy खड़ी कर ली है। इज़राइल का Harop, Harpy, और Spike-NLOS portfolio एक पूरी पीढ़ी के लिए export model बन गया है।

भारत इस race में देर से शामिल हुआ है।

iDEX के तहत कुछ startups उभर रहे हैं। अदानी, टाटा, सोलर, और कई MSME drone production में हैं। पर पैमाना अभी छोटा है।

एक साल में जितने tactical drones भारत बनाता है, चीन एक हफ़्ते में बना सकता है।

यह फ़र्क़ सिर्फ़ production का नहीं है। यह doctrine का है।

drone-saturation की तैयारी के लिए पूरी सेना को एक नए तरीक़े से सोचना पड़ता है। command structure बदलनी पड़ती है। training बदलनी पड़ती है। खरीद का तरीक़ा बदलना पड़ता है। और सबसे ज़रूरी, manpower का वितरण बदलना पड़ता है।

एक drone squadron में 50 लोग 500 unmanned systems चला सकते हैं। एक artillery regiment में 500 लोग 18 तोपें चलाते हैं।

अगर लड़ाई में दोनों का असर बराबर भी हो, तो आदमी का गणित एकदम अलग है।

पेंशन का बिल भी।

समुद्र, आसमान, अंतरिक्ष: जहाँ भविष्य का युद्ध सबसे तेज़ बदल रहा है

ज़मीन की लड़ाई की तस्वीर तो स्पष्ट है। समुद्र, आसमान, और अंतरिक्ष में बदलाव और तेज़ है।

हिंद महासागर पर देखें।

चीनी नौसेना की उपस्थिति 2008 के anti-piracy operations से शुरू हुई। आज स्थायी हो चुकी है। चीनी SSN और SSBN की हिंद महासागर में patrol की आवृत्ति बढ़ रही है। चीनी अनुसंधान-पोत भारतीय EEZ के आसपास नियमित आते हैं।

ज़िबूती में चीनी base। ग्वादर में बढ़ती चीनी मौजूदगी। श्रीलंका में हम्बनटोटा। म्यांमार के क्याकप्यू में access। यह सब एक blue-water sustainment network का हिस्सा हैं।

भारतीय जवाब में पनडुब्बियाँ कम हैं। anti-submarine warfare की क्षमता सीमित है। तीसरे विमानवाहक का फ़ैसला वर्षों से लंबित है। Project-75I की रफ़्तार धीमी है। SSN कार्यक्रम officially स्वीकृत है, पर बजट उसे कब निर्णायक रूप से उठाएगा, स्पष्ट नहीं।

समुद्र में लड़ाई का चेहरा भी बदल रहा है।

autonomous underwater vehicles, unmanned surface vessels, distributed maritime operations, यह सब अब अमेरिकी और चीनी नौसैनिक doctrine का केंद्र हैं। भारतीय नौसेना का इनमें निवेश अभी प्रारंभिक है।

एक पनडुब्बी के design से commissioning तक 15 साल लगते हैं। यानी आज की देरी 2040 की कमी है।

आसमान की तस्वीर इससे भी संवेदनशील है।

वायुसेना की स्वीकृत 42 squadrons में से वर्तमान 31। और गिरावट की दिशा। MiG-21 का अंतिम phase-out चल रहा है। MiG-29 और Mirage-2000 अपने अंतिम चरण में हैं। Jaguar 2030 के आसपास retire होगा।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल विमानों की संख्या नहीं है। वह तो एक symptom है।

असली सवाल यह है कि भविष्य की air power किस तरह की होगी।

मानवरहित wingman। AI से बढ़ी हुई air combat। swarming attacks। hypersonic प्रणालियाँ। छठी पीढ़ी की अवधारणाएं। यह सब अगले बीस साल में air warfare को परिभाषित करेंगे।

चीन का J-20 already operational है। छठी पीढ़ी पर काम चल रहा है। भारत का AMCA, सबसे आशावादी अनुमानों के साथ, 2035 तक induction में आएगा।

यानी फ़ासला बढ़ रहा है। घट नहीं रहा।

अंतरिक्ष और electromagnetic spectrum की कहानी और कम चर्चित है।

आधुनिक युद्ध में satellite-based ISR, navigation, communication, और missile warning निर्णायक हैं। भारत के पास कुछ क्षमता है, पर dedicated military space architecture अभी निर्माण के चरण में है।

Defence Space Agency 2019 में बनी। उसका वास्तविक संचालन-स्तर अभी सीमित है। चीन की Strategic Support Force एक पूरा arm है, जो space, cyber, और electronic warfare को एक framework में जोड़ता है।

बिना इन domains में निर्णायक निवेश के, ज़मीन पर 13 लाख सैनिक रखने का strategic वज़न क्या है?

सीमा पर पैदल सेना की मौजूदगी देहरी पर पहरेदार जैसी है। ज़रूरी है, पर निर्णायक नहीं।

निर्णायक होगा वह जो आसमान में है। जो पानी के नीचे है। जो electromagnetic spectrum में है। जो data fusion centre में है।

इन सब में निवेश अनुसंधान, technology acquisition, और औद्योगिक पैमाने से आता है। पेंशन और वेतन से नहीं।

और भारत का बजट इन सब में चीन से दस से बीस गुना कम ख़र्च कर रहा है। चीन का defence R&D 50 अरब डॉलर के आसपास। भारत का 3 अरब के आसपास। फ़र्क़ पंद्रह गुना।

और हर साल बढ़ रहा है।

भारत-चीन सैन्य तुलना का असली सबक

चीन से तुलना अक्सर बजट के आंकड़ों पर रुक जाती है। 245 अरब डॉलर बनाम 81 अरब डॉलर।

पर असली फ़र्क़ इस आंकड़े के अंदर के composition में है।

चीन ने पिछले एक दशक में सेना का आकार 23 लाख से घटाकर लगभग 20 लाख किया।

यह कटौती ऊपरी नहीं थी। सात पुरानी military regions को पाँच theatre commands में बदला गया। ground forces का हिस्सा कुल manpower में कम किया गया। rocket forces, strategic support force, और cyber-electronic combat इकाइयों को नए अधिकार दिए गए।

यह सिर्फ़ downsizing नहीं था। यह redirection था।

आदमी कम, मशीन ज़्यादा। पैदल सेना कम, missile forces ज़्यादा।

चीन ने एक मूल बात मान ली। बीस-तीस साल बाद का युद्ध जीतने के लिए, बीस-तीस साल पहले का निवेश ज़रूरी है।

भारत का रास्ता बिलकुल उल्टा रहा।

सेना का आकार वही। पेंशन वाले सैनिकों का base फैलता हुआ। अनुसंधान का हिस्सा लगभग वहीं का वहीं। theatre commands अभी अधूरे।

यह कोई सोच-समझकर लिया गया फ़ैसला नहीं है। यह नीतिगत जड़ता है।

NDA-1, UPA, और NDA-2 तीनों ने अलग-अलग प्रयोग किए। K Subrahmanyam, Naresh Chandra, Shekatkar, सब ने काम की सिफ़ारिशें दीं। पर कोई भी सरकार उन्हें पूरी तरह लागू नहीं कर सकी।

वजह सीधी है। हर बड़ा reform विरोध लाता है। vested interests उसे रोकते हैं। राजनीतिक नेतृत्व को रक्षा reform से चुनावी फ़ायदा नहीं दिखता।

चीन ने यह राजनीतिक कीमत चुकाई। उसकी राजनीतिक व्यवस्था ऐसे top-down reforms को लागू कर सकती है।

भारत के लोकतंत्र में यह कठिन है। पर असंभव नहीं। 1991 का आर्थिक reform एक उदाहरण है। 2017 का GST दूसरा। कठिन reforms होते हैं, जब राजनीतिक नेतृत्व उनकी कीमत चुकाने को तैयार हो।

रक्षा reform के लिए ऐसा कोई moment अभी नहीं आया है।

LAC तैनाती, और एक स्थायी हो चुका बोझ

2020 के बाद LAC पर तैनाती ने Revenue ख़र्च में एक स्थायी छलांग जोड़ी है।

अनुमान है कि यह सालाना 25 से 35 हज़ार करोड़ का अतिरिक्त ख़र्च है। यह रकम पहले modernisation के लिए शायद उपलब्ध थी। अब नहीं है।

लद्दाख में एक armoured regiment को सर्दियों में चलाने के लिए हर हफ़्ते तीन सौ टन से ऊपर ईंधन ऊपर पहुंचाना पड़ता है। एक टैंक का ईंधन ख़र्च ठंडे मौसम में सामान्य से 30 से 40 प्रतिशत ज़्यादा है। एक सैनिक को 17 हज़ार फ़ीट पर रखने की सालाना लागत मैदान के मुक़ाबले 4 से 6 गुना ज़्यादा।

चीन ने 2020 में एक ऐसी situation बनाई, जिसकी सीधी कीमत उसे लगभग शून्य है।

उसकी अपनी तैनाती बढ़ी ज़रूर। पर वह तैनाती एक मज़बूत civilian-military infrastructure पर टिकी है, जिसका पैमाना भारत से बहुत ज़्यादा है। भारत के लिए वही तैनाती बेहद महंगी है।

यह एक तरह का बिना लड़ा हुआ युद्ध है।

चीन ने भारत को एक ऐसी financial commitment में बाँधा, जो उसके modernisation बजट को नीचे खींचती है। और जब तक यह तैनाती जारी है, यह खींचाव जारी रहेगा।

भारतीय सेना के अंदर की वह असुविधाजनक सच्चाई

बाहर से ज़्यादातर विश्लेषण इस पर ध्यान देता है कि बजट कम है। अंदर की एक और कहानी है, जिस पर कम बात होती है।

मौजूदा बजट का internal allocation भी सही नहीं है।

भारतीय सेना का headquarters bloat दशकों से चर्चा का विषय रहा है। senior officers की संख्या। command positions का overlap। services के बीच काम का दोहराव। ceremonial और प्रशासनिक कामों में वर्दीधारी लोगों का इस्तेमाल।

यह सब structural inefficiency हैं।

Shekatkar committee ने 2016 में लगभग 99 सिफ़ारिशें दीं, जिनमें से कई manpower और structure से जुड़ी थीं। उनमें से कुछ लागू हुईं। ज़्यादातर नहीं।

logistics का बड़ा हिस्सा अभी भी वर्दीधारी manpower पर चलता है। base operations, ordnance, transport, repair, medical, सब में हज़ारों वर्दीधारी posts हैं, जो potentially civilian workforce से चल सकते हैं।

यह downsizing नहीं होगी। यह role-substitution होगी।

पर वर्दीधारी संगठन आम तौर पर अपनी authority और दायरा कम करने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करते।

CDS की स्थापना 2019 में हुई। theatre commands का गठन कई साल से चर्चा में है। 2024-25 में कुछ progress हुआ। पर पूरी implementation अभी दूर है।

एक theatre command-आधारित structure से headquarters का दोहराव काफ़ी कम हो सकता है। पर हर ऐसा reform service-interests के विरुद्ध जाता है।

रक्षा अनुसंधान की वह कमी, जो हर समस्या के पीछे है

घरेलू उत्पादन का तर्क अधूरा है।

अगर अनुसंधान ख़र्च कम है, तो घरेलू उत्पाद का तकनीकी स्तर सीमित रहेगा। अगर तकनीकी स्तर सीमित है, तो विदेश से खरीद ज़रूरी रहेगी। अगर विदेशी खरीद ज़रूरी है, तो Capital बजट का बड़ा हिस्सा वहाँ जाएगा। अगर Capital बजट का बड़ा हिस्सा वहाँ जा रहा है, तो अनुसंधान के लिए अलग से रकम नहीं बचेगी।

चक्र पूरा हुआ।

इस चक्र को तोड़ने के लिए एक मूल फ़ैसला चाहिए। अनुसंधान ख़र्च को GDP के 0.1 प्रतिशत से कम से कम 0.4 प्रतिशत तक ले जाना।

यह तीन-चार गुने की छलांग है। आर्थिक रूप से कठिन। पर असंभव नहीं।

इसके लिए एक राजनीतिक फ़ैसला चाहिए, जो किसी एक सरकार के पाँच साल के दायरे से लंबा हो। 20 साल का अनुसंधान-निवेश plan, जो हर सरकार में जारी रहे। उसकी संभावना मौजूदा व्यवस्था में सीमित है।

बिना अनुसंधान के, घरेलू उत्पादन का मतलब सिर्फ़ assembly है। और assembly economy मूलतः एक mid-tier defence model है, जो strategic autonomy नहीं देती।

रक्षा सुधार पर राजनीतिक चुप्पी, जिसकी वजह सीधी है

इस पूरे विश्लेषण को एक सवाल पर लौटना चाहिए।

भारत का राजनीतिक नेतृत्व यह बदलाव क्यों नहीं चला रहा?

क्योंकि बदलाव की राजनीतिक कीमत बहुत बड़ी है। और उसका फ़ायदा बहुत दूर है।

एक नेता को पाँच साल के cycle में काम करना होता है। एक रक्षा बदलाव जिसका असली नतीजा पंद्रह से बीस साल बाद आएगा, उसके लिए political incentives नहीं हैं।

अभी reform राजनीतिक नुक़सान देता है। दूर का फ़ायदा किसी और के खाते में जाएगा।

इसके उलट, status quo के राजनीतिक फ़ायदे हैं। पेंशनभोगियों का बड़ा voting bloc। recruitment वाले इलाक़ों में चुनावी महत्व। वर्दीधारी services के अपने वर्ग-हित। defence PSU के क्षेत्र-विशेष महत्व।

हर बड़ा reform इनमें से किसी न किसी से टकराता है।

ऐसी हालत में राजनीतिक नेतृत्व सबसे आसान रास्ता चुनता है। बजट थोड़ा बढ़ाओ। कुछ नए सौदे करो। कुछ make-in-India initiative निकालो। कुछ बहु-वर्षीय योजनाएं घोषित करो। और मूल structural सवालों से बच निकलो।

यह किसी एक सरकार का दोष नहीं है। यह व्यवस्था का स्वभाव है।

2020 गलवान के बाद कुछ नए कदम उठे। theatre commands की दिशा में progress हुई। अग्निपथ आया। आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर बढ़ा।

पर मूल transformation, जिसमें force structure, doctrine, और अनुसंधान का एक साथ पुनर्निर्माण हो, वह अभी शुरू नहीं हुआ।

अंत में

रक्षा बजट की बहस अक्सर इस सवाल पर रुक जाती है कि कितना ख़र्च हो रहा है।

असली सवाल इससे ज़्यादा गहरा है।

भारत किस सेना के लिए बजट बना रहा है?

मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि भारत ज़्यादातर अपनी 1995 की force structure को 2025 में बनाए रखने के लिए ख़र्च कर रहा है। थोड़ा upgrade। थोड़ी नई खरीद। थोड़ा infrastructure।

पर मूल force model वही है।

2040 का युद्ध, अगर वह आता है, sensor-network warfare होगा। computational पैमाने पर लड़ा जाएगा। AI से चलने वाले decision cycles पर। autonomous systems की भीड़ पर। अंतरिक्ष-आधारित command पर। electromagnetic dominance पर।

इस युद्ध में 13 लाख वर्दीधारी soldiers का strategic वज़न उतना नहीं होगा जितना आज माना जाता है। उनकी भूमिका ज़रूरी होगी। पर निर्णायक नहीं।

1962 की दुर्घटना से एक सबक यह था कि बड़ी सेना का मतलब तैयार सेना नहीं होती। यह सबक तब doctrine और तैयारी पर लागू था। आज यही सबक technology और transformation पर लागू होता है।

एक बात बिलकुल साफ़ है।

भारत आज भविष्य की सेना नहीं बना रहा। वह अतीत की सेना को भविष्य तक खींचने की कोशिश कर रहा है।

यह कोशिश एक हद तक चलती रहेगी। फिर उसकी अपनी सीमाएं उसे रोक देंगी।

इस सवाल का जवाब रक्षा मंत्रालय के पास नहीं है। यह जवाब भारतीय राजनीति के पास है।

और भारतीय राजनीति ने अब तक यह जवाब देने से बचने का चुनाव किया है। 2040 आते-आते यह चुनाव भी छिन चुका होगा।

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