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भारत बाईस मिनट में प्रहार कर सकता है। क्या वह बाईस हफ्ते टिक सकता है?

रक्षा विमर्श Logo
Last updated: June 5, 2026 4:11 pm
रक्षा विमर्श संपादकीय टीम
7 hours ago
जनरल द्विवेदी के भाषण की असली ख़बर भारत की सेना नहीं, भारतीय राज्य था
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जनरल द्विवेदी के भाषण की असली ख़बर वह नहीं थी जो सुर्खियों में छपी

19 मई 2026। दिल्ली का मानेकशॉ सेंटर। Centre for Land Warfare Studies (CLAWS) की एक संगोष्ठी।

Contents
  • जनरल द्विवेदी के भाषण की असली ख़बर वह नहीं थी जो सुर्खियों में छपी
  • बाईस मिनट का प्रहार आसान हिस्सा था, असली पहेली अट्ठासी घंटे की चुप्पी में है
  • हर्मूज़ और अर्धचालक एक जैसी कमज़ोरी नहीं, दो अलग बीमारियाँ हैं
  • “पूरे राष्ट्र” की भाषा असल में एक खाली जगह की ओर इशारा करती है
  • भारत का बिखराव चीन की देन नहीं, अपनी ही तीस साल पुरानी आदत है
  • लंबी लड़ाई कारखाने में हारी जाती है, और भारत अभी सबसे ख़तरनाक बीच के दौर में है
  • चीन और पाकिस्तान एक जैसी समस्या नहीं, और एक जैसी तैयारी आत्मघाती होगी
  • असली परीक्षा प्रहार करने की नहीं, यह तय करने की है कि अधिकार किसके पास है

थलसेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी मंच पर खड़े हुए, और अगले दिन की सुर्खियाँ Operation Sindoor पर बनीं। बाईस मिनट का प्रहार। नौ ठिकाने। अट्ठासी घंटे में रुक जाना। यह सब दोहराया गया।

लेकिन भाषण का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य वह नहीं था जो ऑपरेशन के बारे में था। वह वाक्य था जो भारत के बारे में था।

जनरल द्विवेदी ने कहा कि अब सुरक्षा और समृद्धि के बीच कोई सीमा-रेखा नहीं बची। उन्होंने पारंपरिक DIME (Diplomacy, Information, Military, and Economic) ढाँचे का ज़िक्र किया, यानी कूटनीतिक, सूचनात्मक, सैन्य और आर्थिक शक्ति का संयोजन, और कहा कि अब इसमें तकनीक और “पूरे राष्ट्र” की भागीदारी जोड़नी होगी।

सुनने में यह नीति लगती है। पर ध्यान से देखें तो यह नीति की अनुपस्थिति की स्वीकारोक्ति है। जब कोई सेनाध्यक्ष सार्वजनिक मंच से यह कहता है कि देश को अपनी पूरी क्षमता एक दिशा में जोड़नी चाहिए, तो वह असल में यह बता रहा होता है कि अभी वह जुड़ी हुई नहीं है। और यही इस भाषण की असली ख़बर है।

बाईस मिनट का प्रहार आसान हिस्सा था, असली पहेली अट्ठासी घंटे की चुप्पी में है

Operation Sindoor के तथ्य अब सार्वजनिक हैं। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में छब्बीस नागरिक मारे गए। उसके जवाब में 6 और 7 मई की रात भारत ने बहावलपुर, मुरीदके, सियालकोट और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों पर सटीक हथियारों से प्रहार किया। तीनों सेनाओं की संयुक्त कार्रवाई। बाईस मिनट का परिभाषित प्रहार-काल। और फिर अट्ठासी घंटे बाद रुक जाना।

जनरल द्विवेदी ने इस रुकने को “smart power की सबसे पूर्ण अभिव्यक्ति” कहा। सोच-समझकर रुकना। यह जानना कि कौन सा हथियार, कितनी तीव्रता से, किस लक्ष्य तक चलाना है।

यहीं ठहरकर एक कठिन प्रश्न पूछना ज़रूरी है, जो किसी सरकारी विज्ञप्ति में नहीं मिलेगा।

रुकना तभी “रणनीतिक संयम” है, जब आगे बढ़ना एक वास्तविक विकल्प हो। यदि भारत इसलिए रुका क्योंकि उसने रुकना चुना, तो यह तनाव बढ़ने पर भी ऊपरी हाथ बनाए रखने की क्षमता का प्रमाण है। पर यदि भारत इसलिए रुका क्योंकि गोला-बारूद का गणित, अंतरराष्ट्रीय दबाव, या पाकिस्तान के परमाणु संकेत आगे बढ़ने को जोखिम भरा बना रहे थे, तो वह रुकना एक मजबूरी थी, जिसे चुनाव का जामा पहना दिया गया।

बाहर से बैठकर हम यह नहीं जान सकते कि कौन सी बात सच थी। और यह स्वीकार करना ज़रूरी है। लेकिन यह अंतर मामूली नहीं है। पूरी आधुनिक डॉक्ट्रिन इसी एक धारणा पर टिकी है कि आपके पास आगे जाने का विकल्प मौजूद है। यदि वह विकल्प असल में सीमित था, तो अगली बार प्रतिद्वंद्वी यह बात आपसे पहले समझ लेगा।

प्रहार करना सीख लेना एक उपलब्धि है। प्रहार के बाद की स्थिति को अपनी शर्तों पर संभालना उससे कहीं कठिन कला है। सिंदूर ने पहली बात दिखाई। दूसरी अभी अनकही है।

हर्मूज़ और अर्धचालक एक जैसी कमज़ोरी नहीं, दो अलग बीमारियाँ हैं

भाषण में जनरल द्विवेदी ने दो उदाहरण दिए। हर्मूज़ जलडमरूमध्य, जिसे उन्होंने “सक्रिय टकराव का क्षेत्र” कहा। और अर्धचालक, जिनकी चुनी हुई उपलब्धता अब दबाव का औज़ार बन चुकी है। उन्होंने यह भी बताया कि वैश्विक रक्षा व्यय 2.7 ट्रिलियन डॉलर पार कर गया है, जो संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के पूरे बजट से अधिक है।

इन दोनों उदाहरणों को एक साथ रख देना आसान है। पर ये भारत की दो बिल्कुल अलग कमज़ोरियाँ हैं।

हर्मूज़ की कमज़ोरी भूगोल की है, और तत्काल है।

भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, और इसका मोटे तौर पर चालीस से पचास प्रतिशत हर्मूज़ से होकर आता है। यह अनुपात साल-दर-साल बदलता रहता है, और हाल में, जब रूसी तेल की ख़रीद घटी, तो यह फिर बढ़ा है।

संकट के लिए जो समर्पित रणनीतिक तेल भंडार है, वह केवल नौ से दस दिन के आयात के बराबर है। तेल कंपनियों के व्यावसायिक भंडार जोड़ दें तो कुल गुंजाइश कुछ हफ़्तों की बन जाती है, पर वह भी सीमित है। और सबसे अहम बात, यह कमज़ोरी टैंक या मिसाइल से नहीं भरती। यह भंडारण, वैकल्पिक मार्ग और कूटनीतिक पहुँच से भरती है। यानी इसका जवाब सेना के पास है ही नहीं।

अर्धचालक की कमज़ोरी संरचनात्मक है, और दीर्घकालिक। भारत में काम शुरू ज़रूर हुआ है। गुजरात के धोलेरा में टाटा और ताइवान की PSMC का फ़ैब बन रहा है, जिससे पहले wafer 2026 के अंत तक मिलने की उम्मीद है। साणंद में Micron की assembly और testing इकाई फ़रवरी 2026 में चालू हो गई।

पर यहाँ एक बारीकी समझनी ज़रूरी है। ये संयंत्र 28 नैनोमीटर और उससे ऊपर की परिपक्व चिप-तकनीक पर केंद्रित हैं, जो कार, उद्योग और आम इलेक्ट्रॉनिक्स की रीढ़ है। यह वह अत्याधुनिक स्तर नहीं है जो आधुनिक मिसाइल, रडार और उन्नत संचार प्रणालियों की जान है। उस श्रेणी की चिप अब भी बाहर से आती है, और भारत की अपनी योजना में वह 2035 के आसपास की बात है। और जो चीज़ बाहर से आती है, उसकी आपूर्ति संकट के ठीक उसी क्षण रोकी जा सकती है जब उसकी सबसे अधिक ज़रूरत हो।

एक कमज़ोरी का जवाब अगले मानसून तक चाहिए। दूसरी का जवाब अगले दशक तक भी मुश्किल से तैयार होगा। इन्हें एक साँस में बोल देना भाषण के लिए ठीक है। नीति बनाते समय इन्हें मिला देना ख़तरनाक है।

“पूरे राष्ट्र” की भाषा असल में एक खाली जगह की ओर इशारा करती है

जोसफ़ नाय ने smart power की अवधारणा दी थी। यह जानना कि कब कठोर शक्ति चलानी है और कब नरम। जनरल द्विवेदी ने इसी का हवाला दिया, और कहा कि भारत के लिए इसका अर्थ है राष्ट्रीय शक्ति को रणनीतिक विवेक के साथ बरतना।

पर एक देश राष्ट्रीय शक्ति को “एक सुसंगत राष्ट्रीय कार्य” के रूप में तभी चला सकता है, जब उसके पास उसे जोड़ने वाली कोई रीढ़ हो। यहीं भारत की असली कमी है, और यही वह बात है जिसे भाषण छूकर निकल जाता है।

भारत के पास आज तक कोई प्रकाशित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति नहीं है। ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं जो बताए कि देश के ख़तरे क्या हैं, प्राथमिकताएँ क्या हैं, और संसाधन किस क्रम में लगेंगे। इसका मतलब यह नहीं कि भारत के पास सोच नहीं है। सोच है, पर वह बिखरी हुई है, अलग-अलग मंत्रालयों और सेवाओं की फाइलों में। संकट के समय इन्हें जोड़ने वाला कोई स्थायी तंत्र मौजूद नहीं।

DIME में एक अक्षर और जोड़ देना नीति नहीं है। यदि तेल हर्मूज़ पर अटके, चिप की आपूर्ति रुके, सोशल मीडिया पर भ्रम फैले, और उसी समय सीमा पर तनाव बढ़े, तो किस मेज़ पर बैठकर कौन यह तय करेगा कि पहले क्या करना है? आज इसका सीधा उत्तर किसी के पास नहीं। “पूरे राष्ट्र” की भाषा इसी खाली जगह का दूसरा नाम है।

और समस्या केवल पाँचवाँ अक्षर जोड़ देने की नहीं है। DIME का पूरा ढाँचा इस मान्यता पर खड़ा था कि कूटनीति, सूचना, सेना और अर्थव्यवस्था अलग-अलग खाने हैं, जिन्हें अलग-अलग संभाला जा सकता है। तकनीक इस मान्यता को ही तोड़ देती है। एक ही उपग्रह तंत्र निगरानी भी करता है, संचार भी, और बाज़ार के लेनदेन का आधार भी बनता है। समुद्र के नीचे बिछी एक ही केबल से देश का डेटा भी बहता है और उसकी वित्तीय व्यवस्था की धड़कन भी। एक ही चिप मिसाइल के मार्गदर्शन में भी लगती है और आम स्मार्टफ़ोन में भी।

यानी तकनीक चारों खंभों के बीच नहीं, उन सबके भीतर एक साथ बहती है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि DIME में ‘T’ कहाँ जोड़ें। सवाल यह है कि जब एक ही झटका एक साथ चारों खंभों को हिला दे, तब उसे एक जगह बैठकर पढ़ने और जोड़ने वाला कौन है।

भारत का बिखराव चीन की देन नहीं, अपनी ही तीस साल पुरानी आदत है

यहाँ रक्षा विश्लेषण की एक स्थायी कमज़ोरी से बचना ज़रूरी है।

हर भारतीय कमी को चीन के सामने रखकर समझाने की आदत। चीन ने यह किया, इसलिए भारत यह नहीं कर पाया। यह framing आसान है, और प्रायः ग़लत है।

भारत का बिखराव बीजिंग की प्रतिक्रिया नहीं है। उसकी जड़ें भीतर हैं।

खरीद की संस्कृति, जहाँ एक प्रणाली को मंज़ूरी से उत्पादन तक पहुँचने में अक्सर एक दशक लग जाता है, और इसका LAC से कोई सीधा संबंध नहीं।

औद्योगिक विखंडन, जहाँ DRDO, रक्षा सार्वजनिक उपक्रम और निजी क्षेत्र एक-दूसरे को साझेदार कम, प्रतिद्वंद्वी अधिक मानते हैं। बजट की बनावट, जहाँ वेतन और पेंशन का राजस्व बोझ पूँजीगत व्यय को साल-दर-साल निगलता जा रहा है, जिससे नए हथियार ख़रीदने की गुंजाइश सिकुड़ती है। और सेवाओं के बीच की राजनीति, जहाँ थल सेना, वायुसेना और नौसेना अपने-अपने हिस्से की रक्षा करती हैं, और थिएटर कमांड पर बहस वर्षों से एक ही जगह अटकी है।

ये समस्याएँ चीन के उदय से बहुत पुरानी हैं। इनमें से कोई भी बीजिंग के किसी फ़ैसले से पैदा नहीं हुई। इन्हें चीन की छाया में समझाना अपने ही रोग का निदान टाल देना है। यदि असली कारण आंतरिक है, तो उसका इलाज भी आंतरिक होगा। बाहरी ख़तरा एक कारक है, हर चीज़ का मूल नहीं।

लंबी लड़ाई कारखाने में हारी जाती है, और भारत अभी सबसे ख़तरनाक बीच के दौर में है

Ukraine के युद्ध ने एक बात बेरहमी से दिखाई। लंबे संघर्ष सैनिकों की वीरता से नहीं, गोदामों की गहराई से चलते हैं। तोपखाने के गोले लाखों की संख्या में खपते हैं, और सबसे उन्नत पश्चिमी रक्षा उद्योग भी उस माँग के सामने हाँफ़ने लगे। शांति के दशकों में किसी ने इतने भंडार की कल्पना नहीं की थी।

जनरल द्विवेदी ने इसीलिए औद्योगिक उत्पादन और शोध-तंत्र पर ज़ोर दिया। पर भारत के लिए यह कहना आसान, करना कठिन है।

कारगिल 1999 को याद कीजिए। बोफ़ोर्स तोपों ने ऊँचाई पर निर्णायक भूमिका निभाई, पर तब भी गोले की आपूर्ति एक चिंता थी। उससे बहुत पहले, 1962 में, भारत की सबसे बड़ी हार रणनीति की कम और रसद की अधिक थी। सैनिक ऊँचाई पर थे, पर उन तक न पर्याप्त कपड़े पहुँचे, न हथियार, न गोला-बारूद। पहाड़ ने नहीं, आपूर्ति-श्रृंखला ने हराया।

पर इतिहास को छोड़ भी दें, तो वर्तमान भी कम चिंताजनक नहीं।

2017 में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की एक रिपोर्ट ने उजागर किया था कि युद्ध के लिए ज़रूरी 152 में से लगभग चालीस प्रतिशत श्रेणियों का गोला-बारूद केवल दस दिन की तीव्र लड़ाई के लिए बचा था, जबकि निर्धारित मानक चालीस दिन का है, और न्यूनतम स्वीकार्य स्तर भी बीस दिन।

सबसे बड़ी कमी तोपख़ाने और टैंक के गोलों में थी, यानी ठीक उन हथियारों में जो लंबी लड़ाई की रीढ़ हैं।

उसके बाद स्थिति सुधारने के प्रयास हुए, सेना के उप-प्रमुख को आपातकालीन ख़रीद के अधिकार मिले। पर मूल अड़चन वहीं की वहीं है। ख़रीदकर भंडार भर लेना एक बात है। संकट के बीच, महीनों तक, लगातार बनाते रहना बिल्कुल दूसरी। पहला काम पैसे से होता है। दूसरा सिर्फ़ कारखाने से।

आज भारत बीच के दौर में खड़ा है। न पूरी तरह बाहर पर निर्भर, न पूरी तरह आत्मनिर्भर।

कई महत्वपूर्ण प्रणालियों के पुर्ज़े, इंजन और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स अब भी आयात होते हैं। आत्मनिर्भर भारत एक नारे के रूप में जितना आकर्षक है, ज़मीन पर उतना ही अधूरा।

और इतिहास गवाह है कि सबसे ख़तरनाक समय यही बीच का दौर होता है, जब देश इतना स्वतंत्र हो चुका होता है कि बड़े दावे करे, पर इतना नहीं कि लंबी लड़ाई अकेले झेल सके।

चीन और पाकिस्तान एक जैसी समस्या नहीं, और एक जैसी तैयारी आत्मघाती होगी

भारत के सामने दो प्रतिद्वंद्वी हैं, और दोनों का तर्क अलग है। इन्हें गंभीरता से समझना ज़रूरी है, क्योंकि किसी को कम आँकना अपने ही विश्लेषण को कमज़ोर करता है।

पाकिस्तान अस्थिरता को हथियार की तरह बरतता है। अचानक संकट, सीमा पर तनाव, आतंक के ढाँचे का इस्तेमाल। उसकी ताकत निरंतरता में नहीं, झटके में है। उसके लिए भारत को तेज़ और सटीक जवाब चाहिए, जो सिंदूर ने दिखाया।

चीन का तरीका इसके उलट है। वह धीरज से काम करता है, और उसकी ताकत किसी एक हथियार में नहीं, पूरी व्यवस्था की एकजुटता में है। इसे ठोस रूप में देखना ज़रूरी है, वरना तुलना खोखली रह जाती है।

सबसे पहले पैमाना। हुल की संख्या के हिसाब से चीनी नौसेना अब दुनिया की सबसे बड़ी है, अमेरिकी आकलनों के अनुसार 370 से अधिक जहाज़ और पनडुब्बियाँ। और इससे भी बड़ी बात उसके पीछे का कारख़ाना है।

एक अनुमान के अनुसार चीन की जहाज़ निर्माण क्षमता वैश्विक क्षमता के लगभग आधे के बराबर है। यही फ़र्क लंबी लड़ाई में सबसे अधिक मायने रखता है, क्योंकि जो देश तेज़ी से जहाज़, गोले और पुर्ज़े बना सकता है, वही टिकता है। दूसरा, सीमा पर ढाँचा। पिछले एक दशक में चीन ने तिब्बत के पठार पर सड़कों, रेल, हवाई पट्टियों और दोहरे उपयोग वाले सीमावर्ती गाँवों का जाल बिछाया है।

इसका सीधा अर्थ है कि वह अपनी सेना को अब ऊँचाई पर पूरे साल, तेज़ी से और भारी संख्या में पहुँचा और टिका सकता है। यह वही रसद-गहराई है जिसकी कमी ने 1962 में भारत को हराया था। अब वह बढ़त दूसरी तरफ़ है।

और सबसे गहरी बात, सैन्य-असैन्य संलयन। चीन में तकनीक, उद्योग और सेना का गुँथा होना कोई संयोग नहीं, एक घोषित राष्ट्रीय नीति है। नागरिक कंपनी का शोध सीधे सैन्य काम आ सके, इसके लिए पूरा तंत्र बना है।

ध्यान दीजिए, यही वह “पूरे राष्ट्र” वाली एकजुटता है जिसकी ओर जनरल द्विवेदी इशारा कर रहे थे। फ़र्क बस यह है कि चीन में वह पहले से मौजूद है, भारत में अभी एक माँग है।

यहाँ एक बात साफ़ रखनी ज़रूरी है, ताकि विश्लेषण फिर उसी पुरानी आदत में न फिसले। चीन भारत की आंतरिक कमज़ोरियों का कारण नहीं है। वह उनका सबसे साफ़ आईना है। उसके सामने रखकर भारत की कमी ज़्यादा तीखी दिखती है, पर वह कमी चीन के बिना भी वहीं रहती।

उसके लिए भारत को झटके का नहीं, लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता का जवाब चाहिए। यहीं भारत की असली थकान है।

पाकिस्तान लगातार ध्यान खींचता रहता है, हर कुछ महीने में एक संकट। और उसी शोर के बीच चीन चुपचाप वह ढाँचा खड़ा करता रहता है जो दस साल बाद मायने रखेगा। भारत का ख़तरा यह है कि वह तात्कालिक के पीछे भागते हुए दीर्घकालिक से नज़र हटा बैठे। एक ही तैयारी से दोनों मोर्चे नहीं संभलते। और यह मान लेना कि संभल जाएँगे, सबसे महँगी ग़लती होगी।

असली परीक्षा प्रहार करने की नहीं, यह तय करने की है कि अधिकार किसके पास है

जनरल द्विवेदी ने एक तीखी बात कही। दुनिया को पढ़ना होगा जैसी वह है, वैसी नहीं जैसी हम चाहते हैं। यह सलाह उनके अपने भाषण पर भी लागू होती है।

Operation Sindoor ने यह दिखा दिया कि भारत बाईस मिनट में संगठित प्रहार कर सकता है। पर आधुनिक दबाव बाईस मिनट का नहीं होता। वह हफ़्तों चलता है, और एक साथ कई दिशाओं से आता है। बंदरगाह पर अटका माल। महँगा होता बीमा। डगमगाते बाज़ार। फैलती अफवाहें। और इन सबके बीच कहीं सीमा पर एक छोटी घटना।

ऐसे संकट के अट्ठासीवें घंटे में सवाल यह नहीं होगा कि भारत प्रहार कर सकता है या नहीं। सवाल यह होगा कि क्या भारतीय राज्य उस क्षण एक स्वर में निर्णय ले सकता है, जब तेल मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, सेना और विदेश नीति को एक साथ, एक ही दिशा में चलना हो।

और उससे भी कठिन सवाल, जिसका उत्तर अभी किसी दस्तावेज़ में नहीं है। उस क्षण निर्णय का अधिकार किसके पास होगा।

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राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा मामलों पर केंद्रित लेखक, जो भारतीय सैन्य आधुनिकीकरण, सीमा सुरक्षा, मिसाइल क्षमता, समुद्री शक्ति और उभरती सैन्य तकनीकों पर विस्तृत विश्लेषण लिखते हैं। इनका फोकस जटिल रणनीतिक विषयों को स्पष्ट और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना है।
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रक्षा विमर्श एक स्वतंत्र हिंदी रक्षा एवं भू-राजनीतिक विश्लेषण मंच है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य आधुनिकीकरण, इंडो-पैसिफिक रणनीति, रक्षा तकनीक और वैश्विक सामरिक घटनाक्रमों पर गहन एवं तथ्याधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। मंच का उद्देश्य हिंदी पाठकों तक गंभीर, शोध-आधारित और संदर्भपूर्ण रक्षा विमर्श पहुंचाना है।

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