लंबा युद्ध उत्पादन क्षमता से लड़ा जाता है, और यहीं BHAVYA की असली परीक्षा है
2023 की एक सच्चाई ने पश्चिमी रक्षा योजनाकारों को हिला दिया, और वह कोई नया हथियार नहीं था। वह एक तोप का गोला था। यूक्रेन युद्ध के दूसरे साल में यूरोप को समझ आया कि वह जितने गोले पूरे साल में बना सकता है, मोर्चे पर उतने कुछ ही हफ़्तों में जल जाते हैं। दशकों तक जिन देशों ने अपनी सेनाओं को दुनिया की सबसे आधुनिक सेना माना, वे अचानक एक पुराने सच के सामने खड़े थे। लंबा युद्ध तकनीक से नहीं चलता। वह उत्पादन लाइन से चलता है।
इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार की भारत औद्योगिक विकास योजना, यानी BHAVYA योजना को देखिए। ₹33,660 करोड़, सौ औद्योगिक पार्क, छह साल की अवधि, वित्त वर्ष 2026-27 से 2031-32 तक। अख़बारों ने इसे आर्थिक ख़बर की तरह छापा, रोज़गार और निवेश के आँकड़ों के साथ। और यहीं चूक हुई।
यह योजना आर्थिक भी है, पर इसका सबसे गहरा अर्थ रक्षा से जुड़ा है।
एक ऐसे देश के लिए जो दो परमाणु पड़ोसियों के बीच बैठा है, सबसे बड़ा अनकहा सवाल यही है। किसी लंबे संकट में उसकी फ़ैक्ट्रियाँ चलती रहेंगी या नहीं।
यह विश्लेषण उसी अनकहे सवाल के इर्द-गिर्द है। और इसका जवाब उतना आशावादी नहीं है जितना सरकारी विज्ञप्ति सुझाती है, न उतना निराश जितना आदतन आलोचक मान लेते हैं।
गोले ने जो आईना दिखाया
पहले यह समझ लें कि यूक्रेन ने असल में क्या उजागर किया, क्योंकि भारत में इसे बहुत सतही तरीके से दोहराया जाता है।
बात सिर्फ़ यह नहीं थी कि गोले कम पड़ गए। बात यह थी कि पश्चिम ने दशकों से अपनी रक्षा औद्योगिक व्यवस्था को एक ख़ास मान्यता पर खड़ा किया था।
मान्यता यह थी कि भविष्य के युद्ध छोटे होंगे, सटीक होंगे, और तकनीक की श्रेष्ठता से जल्दी निपट जाएँगे। इसलिए गोला-बारूद की उत्पादन लाइनें सिकोड़ दी गईं। भंडार न्यूनतम रखे गए। जो उद्योग बचा, वह कुछ महँगे, उन्नत हथियार बनाने पर केंद्रित हो गया, बड़े पैमाने पर सस्ते गोले बनाने पर नहीं।
फिर एक ऐसा युद्ध आया जो लंबा खिंचा। और भंडार ने झूठ बोल दिया।
यहाँ रक्षा का एक बुनियादी सबक है जिसे हिंदी लेखन अक्सर छोड़ देता है।
भंडार आपको बताता है कि आप कितने दिन लड़ सकते हैं। पर वह यह नहीं बताता कि आप कितने दिन लड़ते रह सकते हैं। दोनों अलग चीज़ें हैं।
पहला एक स्थिर संख्या है। दूसरा एक बहती हुई क्षमता है, जो हर महीने इस पर निर्भर करती है कि आपकी फ़ैक्ट्रियाँ कितना बना रही हैं।
लंबी लड़ाई दूसरी चीज़ से तय होती है, पहली से नहीं। इसे रक्षा शब्दावली में लंबी लड़ाई के लिए गोला-बारूद की गहराई कहते हैं। पर असली बात भंडार नहीं, उसे लगातार भरते रहने की क्षमता है।
यूक्रेन ने एक और चीज़ दिखाई।
आधुनिक युद्धक्षेत्र अब सस्ती, बड़ी संख्या में बनने वाली चीज़ों को निगलता है। ड्रोन हज़ारों की संख्या में गिरते और बनते हैं। यह पुराने ढंग की औद्योगिक भूख है, इक्कीसवीं सदी के पैकेज में। और यह भूख वही व्यवस्था मिटा सकती है जिसके पास गहराई हो, ऊँचाई नहीं।
अब इस आईने को भारत की ओर मोड़िए।
भारत की औद्योगिक कमज़ोरी चीन की देन नहीं है
रक्षा विश्लेषण की एक स्थायी आदत है। वह भारत की हर औद्योगिक समस्या को चीन के सामने रखकर समझाता है। यह आसान framing है, इसलिए default बन गई है। पर इस मामले में यह ग़लत framing है, और इस ग़लती को पहचानना ज़रूरी है, वरना पूरा विश्लेषण भटक जाता है।
भारत की औद्योगिक सुस्ती बीजिंग से नहीं आई। वह घर के भीतर से आई।
1991 के सुधारों के बाद भारत तेज़ी से बढ़ा, पर असमान रूप से। सेवा क्षेत्र उड़ान भर गया। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, डिजिटल सेवाएँ। इन्होंने भारत को वैश्विक पहचान दी। पर विनिर्माण कभी उस ऊँचाई तक नहीं पहुँचा जहाँ वह चीन, दक्षिण कोरिया या वियतनाम जैसा निर्यात-आधारित औद्योगिक इंजन बन सके। भारत में उद्योग थे। पर औद्योगिक व्यवस्था बिखरी हुई थी।
क्यों?
कारण एक नहीं, कई हैं, और उनमें से शायद ही कोई चीन से जुड़ा है।
ज़मीन अधिग्रहण एक राज्य में सबसे बड़ी बाधा है, दूसरे में बिजली की अस्थिरता। कहीं बंदरगाह बहुत दूर है, कहीं सड़क संपर्क टूटा हुआ। पर इन दृश्य बाधाओं के नीचे एक गहरी चीज़ बैठी है। संस्थागत जड़ता।
तीस साल से व्यवस्था ने एक ढर्रा पकड़ रखा है, जहाँ एक कारखाना लगाने के लिए दर्जनों विभागों से अलग-अलग मंज़ूरी लेनी पड़ती है। निर्णय से उत्पादन तक का यह फ़ासला अक्सर दो से चार साल खींच जाता है। इस दौरान पूँजी फँसी रहती है, लागत चढ़ती रहती है, और कई परियोजनाएँ उत्पादन शुरू होने से पहले ही दम तोड़ देती हैं।
इस जड़ता में खरीद संस्कृति की अपनी अड़चनें घुली हैं। इसमें DRDO, सार्वजनिक रक्षा उपक्रमों, निजी क्षेत्र और MSME की परत के बीच का बिखराव है, जिसे LAC से जोड़ना ख़ुद को धोखा देना है। और इसमें बजट की संरचना है। यह सबसे कम चर्चित, पर शायद सबसे ताक़तवर कारक है।
रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन यानी राजस्व व्यय में चला जाता है। जो बचता है, वह पूँजीगत व्यय, यानी नए उपकरण और नई क्षमता, पर लगातार दबाव में रहता है। एक ऐसी व्यवस्था जो अपने ही वर्तमान का बोझ ढोने में हाँफ रही हो, वह भविष्य की औद्योगिक गहराई कैसे बनाए?
इन सब के ऊपर सेवाओं के बीच की राजनीति है। थल सेना, वायुसेना और नौसेना अक्सर अपने-अपने हित साधती हैं, और औद्योगिक प्राथमिकताएँ इस खींचतान में बँट जाती हैं।
यह सब आंतरिक है। इसे आंतरिक रूप से ही समझना होगा। चीन एक ख़तरा है, एक प्रेरणा भी, पर वह भारत की औद्योगिक कमज़ोरी की जड़ नहीं है। जड़ घर के भीतर है। और BHAVYA योजना की असली परीक्षा भी यहीं है, बीजिंग से तुलना में नहीं।
घोषणाओं का एक कब्रिस्तान, जिसके बीच BHAVYA योजना को पढ़ा जाना चाहिए
भारत ने पहले भी बड़ी औद्योगिक योजनाएँ देखी हैं। इसलिए BHAVYA योजना को चीन की छाया में नहीं, इस इतिहास की रोशनी में परखना ज़्यादा ईमानदार है।
2005 का विशेष आर्थिक क्षेत्र क़ानून याद कीजिए। उससे जो उम्मीद बँधी थी, वह ज़मीन की राजनीति, कर नीति की अनिश्चितता और माँग की कमी में काफ़ी हद तक बिखर गई।
2011 की राष्ट्रीय विनिर्माण नीति में राष्ट्रीय निवेश और विनिर्माण क्षेत्र, यानी विशाल औद्योगिक नगर बनाने की बात थी।
उनमें से अधिकांश कागज़ पर ही रहे। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा वर्षों से बन रहा है, और उसकी रफ़्तार बताती है कि भारत में बड़े ढाँचे ज़मीन पर कितने धीरे उतरते हैं।
इस इतिहास का सबक चीन से नहीं आता।
वह भारत की अपनी संस्थागत आदत से आता है। नीति की घोषणा और ज़मीन पर क्रियान्वयन के बीच का फ़ासला भारत की सबसे पुरानी और सबसे जिद्दी कमज़ोरी है। योजनाएँ शानदार बनती हैं। फिर वे राज्य-केंद्र समन्वय, भूमि की उलझन और प्रशासनिक सुस्ती में फँस जाती हैं।
BHAVYA योजना को इसी कब्रिस्तान के बीच खड़ा होना है।
इसका डिज़ाइन पिछली योजनाओं से कुछ मायनों में बेहतर है, और यह स्वीकार करना चाहिए। पर बेहतर डिज़ाइन और बेहतर परिणाम एक चीज़ नहीं हैं। यह फ़र्क पूरे विश्लेषण की धुरी है।
योजना का डिज़ाइन कहाँ सचमुच समझदार है
अब देखिए कि BHAVYA योजना वास्तव में करती क्या है, और कहाँ इसका डिज़ाइन पुरानी योजनाओं से आगे है।
मॉडल का नाम plug-and-play है, यानी आपस में जुड़ी, पहले से तैयार औद्योगिक व्यवस्था। विचार यह है कि कंपनी को ज़मीन, बिजली, पानी, सड़क और मंज़ूरी के लिए वर्षों न जूझना पड़े। यह सब पहले से तैयार मिले, और वह सीधे उत्पादन पर ध्यान दे।
हर पार्क सौ से एक हज़ार एकड़ तक का होगा। पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों में यह सीमा घटाकर 25 एकड़ रखी गई है। यह लचीलापन समझदारी का संकेत है, क्योंकि एक ही औद्योगिक नक़्शा पूरे देश पर थोपना भूगोल को नकारना होता।
केंद्र कोर अवसंरचना के लिए प्रति एकड़ एक करोड़ रुपये तक की सहायता देगा। साथ ही बाहरी संपर्क के लिए परियोजना लागत का एक हिस्सा भी, ताकि पार्क राजमार्गों, रेल और बंदरगाहों से जुड़ सकें।
पार्कों को तीन परतों में बाँटा गया है।
कोर अवसंरचना, यानी सड़क, पानी, उपयोगिताएँ।
मूल्यवर्धित अवसंरचना, यानी परीक्षण प्रयोगशालाएँ, गोदाम, MSME के लिए बने-बनाए शेड।
और सामाजिक अवसंरचना, यानी श्रमिक आवास, स्वास्थ्य केंद्र, बुनियादी सुविधाएँ।
एक छोटा-सा ब्योरा ध्यान खींचता है, और यही बताता है कि सोच बदली है।
पार्कों में भूमिगत उपयोगिता गलियारे रखे गए हैं, ताकि मरम्मत के लिए बार-बार खुदाई न करनी पड़े और कारखाने की लाइन रुके नहीं।
यह तकनीकी बात लगती है, पर इसका अर्थ गहरा है। यह वह सोच है जो उत्पादन की निरंतरता को केंद्र में रखती है, सिर्फ़ उत्पादन की शुरुआत को नहीं। भारतीय औद्योगिक क्षेत्रों में यह सोच दशकों से अनुपस्थित रही है।
पार्कों का चुनाव challenge mode से होगा, यानी राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा से। योजना NICDC के ज़रिए चलेगी, और इसके पीछे दिल्ली-मुंबई जैसे गलियारों का अनुभव है। पहले चरण में पचास तक पार्क बनने की बात है।
यह सब सतह पर ठोस लगता है। अब एक क़दम गहरे जाइए।
और किस चीज़ को यह छूता तक नहीं
यहाँ सबसे ज़रूरी विश्लेषणात्मक भेद आता है, जिसे अधिकांश हिंदी रक्षा लेखन मिला देता है। क्षमता, मुद्रा और सिद्धांत तीन अलग चीज़ें हैं।
क्षमता का अर्थ है कि देश कुछ बना सकता है। मुद्रा का अर्थ है कि वह उसे बनाने के लिए तैनात भी है, सही जगह, सही मात्रा में। और सिद्धांत वह सोच है जो तय करती है कि क्या, कितना और किसके लिए बनाया जाए। BHAVYA योजना योजना मुख्यतः पहली चीज़ की ओर एक क़दम है, और वह भी एक ख़ास तरह की क्षमता की ओर।
तैयार ज़मीन देने से कारखाना खड़ा हो सकता है। पर उस कारखाने के भीतर जो असली औद्योगिक गहराई चाहिए, वह किसी पार्क की चारदीवारी से पैदा नहीं होती। वह गहराई कई चीज़ों में है।
मशीन बनाने वाली मशीनें, यानी मशीन टूल्स, जिनमें भारत आज भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। उन्नत चिप निर्माण, जो किसी प्लग-एंड-प्ले पार्क का विषय नहीं है, क्योंकि वह एक अलग, बेहद पूँजी-सघन और तकनीक-सघन दुनिया है।
महत्वपूर्ण कच्चे माल और घटकों की आपूर्ति श्रृंखला, जिसका बड़ा हिस्सा अब भी बाहर से आता है। और सबसे ऊपर, कुशल कारीगरों और इंजीनियरों की वह सघन परत, जो किसी कौशल केंद्र से रातोंरात नहीं बनती।
यानी BHAVYA योजना प्रवेश का दरवाज़ा चौड़ा करती है। यह अपने आप में मूल्यवान है, क्योंकि भारत का दरवाज़ा वाकई सँकरा रहा है। पर भीतर की गहराई यह अकेले नहीं बना सकती।
यह मान लेना कि तैयार ज़मीन और सिंगल-विंडो मिलते ही भारत औद्योगिक रूप से गहरा हो जाएगा, वही भ्रम है जो SEZ और राष्ट्रीय विनिर्माण नीति के समय भी पाला गया था।
सच्चाई यह है कि सबसे कठिन हिस्सा इस योजना के दायरे के बाहर है। और इसे स्वीकार करना इस योजना को कमतर आँकना नहीं, बल्कि ईमानदारी से देखना है।
राज्यों की परीक्षा, और दो गति वाली अर्थव्यवस्था का ख़तरा
Challenge mode एक चतुर विचार है, पर उसकी एक छाया भी है।
राज्यों को आपस में होड़ करनी होगी, यह साबित करते हुए कि कौन तेज़ मंज़ूरी देता है, किसके पास बेहतर परिवहन ढाँचा है, और कौन निवेश को वाकई आकर्षित कर सकता है।
सिद्धांत में यह सबसे तैयार राज्यों को पुरस्कृत करता है। व्यवहार में यह भारत की एक असुविधाजनक सच्चाई उजागर करता है। भारत एक समान प्रशासनिक क्षमता वाला देश नहीं है।
कुछ राज्य फ़ाइलें हफ़्तों में निपटाते हैं। कुछ अब भी महीनों में अटकाते हैं। Challenge mode इस अंतर को छिपाएगा नहीं। वह उसे बढ़ाएगा। और इसका परिणाम संरचनात्मक हो सकता है।
जो राज्य तेज़ हैं, वे और तेज़ हो जाएँगे, क्योंकि निवेश सफलता के पीछे भागता है। जो पीछे हैं, वे और पीछे छूट सकते हैं। भारत के भीतर दो अलग अर्थव्यवस्थाएँ उभर सकती हैं। एक हिस्सा वैश्विक उत्पादन केंद्र बने, और बाक़ी सिर्फ़ उपभोक्ता बाज़ार रह जाए।
रक्षा के नज़रिये से यह छोटी बात नहीं। भारत की रक्षा औद्योगिक गहराई का कुछ ही कोनों में सिमटना एक नई कमज़ोरी पैदा करता है। यदि देश की उत्पादन क्षमता दो-तीन क्षेत्रों में केंद्रित हो, तो संकट के समय वही केंद्रीकरण एक नाज़ुक बिंदु बन जाता है।
एक ही क्षेत्र पर निर्भरता का अर्थ है एक ही क्षेत्र पर ख़तरा। फैलाव और अतिरेक, यानी क्षमता को कई जगह बिखेरना, युद्धकालीन उत्तरजीविता की बुनियादी शर्त है। challenge mode का तर्क इस शर्त के विपरीत खींचता है। यह विरोधाभास योजना के डिज़ाइन में बैठा है, और शायद इसका कोई आसान हल नहीं।
भूगोल इस तस्वीर को और जटिल करता है। हिमालय की अपनी माँगें हैं, हिंद महासागर की अपनी, और पूर्वोत्तर की अपनी। एक देशव्यापी औद्योगिक नीति इन अलग-अलग तर्कों को एक साँचे में नहीं ढाल सकती। 25 एकड़ वाली छूट इस बात का संकेत है कि सरकार इसे कुछ हद तक समझती है। पर संकेत और समाधान में फ़ासला होता है।
युद्ध अब उत्पादन लाइन पर लड़ा जाता है
अब उस सवाल पर लौटिए जिससे यह लेख शुरू हुआ, क्योंकि यहीं BHAVYA योजना का असली सामरिक अर्थ छिपा है।
आधुनिक संकट लंबे खिंचते हैं, और लंबे संकट भंडार से नहीं, उत्पादन से तय होते हैं। हथियार ख़रीदे जा सकते हैं। पर लड़ाई के बीच जब खपत भंडार से तेज़ हो जाए, तब केवल वही देश टिकता है जिसके पास घर पर चलती हुई उत्पादन व्यवस्था हो। भारत के लिए यह सबक सबसे तीखा है, क्योंकि उसकी भौगोलिक स्थिति सबसे कठिन है।
दो परमाणु संपन्न पड़ोसी, और दोनों मोर्चों पर अलग-अलग तरह का दबाव। एक तरफ़ एक विशाल औद्योगिक शक्ति, दूसरी तरफ़ एक ऐसी सेना जिसका आतंक-तंत्र से पुराना रिश्ता है। ऐसे में दो-मोर्चों की किसी लंबी स्थिति में आयात के दरवाज़े सबसे पहले बंद होते हैं, या कम से कम धीमे पड़ जाते हैं।
हथियार बेचने वाले देश तटस्थता का दबाव झेलते हैं, क़ीमतें चढ़ती हैं, और आपूर्ति अनिश्चित हो जाती है। ठीक उसी क्षण घरेलू उत्पादन एक रणनीतिक संपत्ति बन जाता है, बाज़ार की वस्तु नहीं।
यहाँ BHAVYA जैसी योजना का सामरिक मूल्य उभरता है। यह सीधे हथियार नहीं बनाएगी, और यह दावा करना ग़लत होगा कि बनाएगी। पर इसके पार्क वह नागरिक औद्योगिक आधार बन सकते हैं जिस पर रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, ड्रोन निर्माण, रडार के घटक और मानवरहित प्रणालियों का उत्पादन खड़ा हो।
आधुनिक युद्ध का बड़ा हिस्सा अब इन्हीं चीज़ों से बनता है, और ये चीज़ें ठीक वैसी हैं जैसी एक सामान्य इलेक्ट्रॉनिक्स या एयरोस्पेस घटक फ़ैक्ट्री बनाती है। यही दोहरे-उपयोग की क्षमता है। एक नागरिक ढाँचा जो ज़रूरत पड़ने पर सैन्य उत्पादन की ओर मुड़ सके।
पर यहाँ भारत की रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी की असली हालत पर रुकना ज़रूरी है, वरना यह विश्लेषण भी आशावाद में बह जाएगा।
भारत ने पिछले वर्षों में कई क़दम उठाए हैं। आयुध निर्माणी बोर्ड को कई रक्षा उपक्रमों में बदला गया। आयात रोकने के लिए घरेलू उत्पादन की सूचियाँ जारी हुईं। निजी क्षेत्र और MSME को रक्षा उत्पादन में जगह देने की कोशिश हुई। उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन जैसी योजनाएँ आईं।
पर इनमें से अधिकांश अभी अपनी पूरी क्षमता से बहुत दूर हैं। DRDO, सार्वजनिक उपक्रम और निजी क्षेत्र अब भी एक-दूसरे से कटे हुए द्वीपों की तरह काम करते हैं। MSME की परत, जो किसी भी गहरी रक्षा अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है, अब भी पतली और बिखरी है।
सच्चाई यह है कि भारत की रक्षा क्षमता पिछले दशक में बढ़ी ज़रूर है, पर वह गहराई अब भी नहीं बनी जो एक लंबे, उच्च-तीव्रता वाले संकट में चाहिए होगी। BHAVYA योजना इस गहराई की ओर एक संभावित आधार है। यह आधार है, इमारत नहीं।
GatiShakti का दोहरा अर्थ
BHAVYA योजना को PM GatiShakti नेटवर्क से जोड़ा गया है, ताकि रेल, राजमार्ग, बंदरगाह और माल गलियारे एक साथ बुने जा सकें।
आर्थिक तर्क सीधा है। भारत की लॉजिस्टिक्स लागत वर्षों से ऊँची रही है। कई बार भारतीय उत्पाद सिर्फ़ इसलिए वैश्विक होड़ में पिछड़ जाते हैं क्योंकि कारखाने से बंदरगाह तक माल पहुँचाना महँगा और धीमा है।
पर यही ढाँचा एक दूसरा काम भी करता है, और रक्षा विमर्श के लिए यही असली बात है। जो रेल और सड़क व्यापार के लिए बनती है, वही संकट के समय सैनिक, गोला-बारूद और उपकरण आगे पहुँचाती है। दूर तक सैन्य शक्ति पहुँचाने की क्षमता आधे में मोर्चे पर नहीं, बल्कि उससे बहुत पीछे, परिवहन की रीढ़ पर तय होती है।
यहाँ इतिहास को बुलाइए, क्योंकि भारत के पास इसका कड़वा अनुभव है। 1962 में चीन के साथ टकराव में भारत की एक बड़ी विफलता मोर्चे पर नहीं, उसके पीछे की रसद में थी। सैनिक ऊँचाई पर थे, पर उन तक समय पर पहुँचना, उन्हें खिलाना और गोली पहुँचाना व्यवस्था के बस में नहीं था।
1999 में कारगिल की ऊँचाइयों पर तोपखाने की भूमिका निर्णायक रही, और उस तोपखाने को लगातार गोले पहुँचाते रहना अपने आप में एक अभियान था। ये कोई पुरानी कहानियाँ नहीं हैं।
ये उसी तर्क के पुराने रूप हैं जो आज भी ज़िंदा है।
अब लद्दाख की कल्पना कीजिए। सर्दियों में जब दर्रे बंद होने लगते हैं, अग्रिम चौकियों तक ईंधन, राशन और पुर्ज़े पहुँचाना अपने आप में एक लड़ाई बन जाता है।
एक टैंक रेजिमेंट को ऊँचाई पर सर्दियों भर चालू रखने के लिए हर हफ़्ते भारी मात्रा में ईंधन ऊपर ढोना पड़ता है, और यह सब मोर्चे पर पहली गोली चलने से बहुत पहले शुरू होने वाली कवायद है। जो परिवहन व्यवस्था सामान्य दिनों में सामान ढोती है, वही उस कवायद की रीढ़ बनती है।
आर्थिक ढाँचा और राष्ट्रीय सुरक्षा अलग चीज़ें नहीं हैं। यही GatiShakti का दोहरा अर्थ है।
चीन ने यह बात दशकों पहले समझ ली थी। उसने तिब्बत में सड़क, रेल और हवाई पट्टियाँ इसी दोहरे मक़सद से बिछाईं, ताकि शांति के समय व्यापार चले और संकट के समय सेना तेज़ी से आगे बढ़ सके। प्रतिद्वंद्वी को कम आँकना भूल होगी।
उसने अपनी सीमा तक की पहुँच को एक सोची-समझी रणनीति की तरह बनाया, टुकड़ों में नहीं। भारत अब उसी सोच की ओर बढ़ रहा है। पर यहाँ एक चेतावनी भी है। नक़्शे पर खींची रेखा और ज़मीन पर बिछी पटरी में फ़र्क होता है। GatiShakti का असली मूल्य घोषणाओं में नहीं, पूरे हो चुके गलियारों में मापा जाएगा।
चीन का विकल्प, या सिर्फ़ एक और दरवाज़ा
कोविड और अमेरिका-चीन तनाव के बाद कंपनियाँ चीन से बाहर एक अतिरिक्त उत्पादन केंद्र चाहती हैं। इसे China Plus One कहा जाता है। भारत ख़ुद को इसका स्वाभाविक दावेदार मानता रहा है। पर इस आत्मविश्वास के साथ थोड़ी ईमानदारी ज़रूरी है।
China Plus One का अर्थ यह नहीं कि दुनिया चीन को छोड़ रही है। अर्थ यह है कि कंपनियाँ चीन के अलावा एक और विकल्प चाहती हैं, ताकि जोखिम बँट जाए। यानी होड़ चीन की जगह लेने की नहीं, उसके पास खड़े होने की है। और इस होड़ में भारत अकेला नहीं है।
चीन की ताक़त को ठीक से समझना होगा, क्योंकि उसे कम आँकना विश्लेषण को कमज़ोर करता है।
चीन की ताक़त सिर्फ़ उसकी फ़ैक्ट्रियाँ नहीं हैं। वह उसकी आपूर्ति श्रृंखला की विशाल गहराई है, जहाँ किसी भी पुर्ज़े का निर्माता कुछ ही किलोमीटर के भीतर मिल जाता है। वह उसकी मशीन बनाने वाली मशीनों की क्षमता है। वह उसका बंदरगाह नेटवर्क है।
और सबसे ऊपर, वह दशकों में बनी एक औद्योगिक संस्कृति है, जो ज़रूरत पड़ने पर नागरिक उत्पादन को सैन्य उत्पादन में बदल सकती है।
यह आख़िरी बात रक्षा विमर्श के लिए सबसे चिंताजनक है। चीन की औद्योगिक गहराई एक सैन्य संपत्ति भी है।
भारत को इस गहराई तक पहुँचने में लंबा समय लगेगा। यह मान लेना कि सौ पार्क यह दूरी पाट देंगे, ख़ुद को बहलाना है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं कि भारत चीन का विकल्प बनेगा या पूरक। वह सवाल अहंकार से उपजा है।
असली सवाल आंतरिक है। क्या भारत वह उत्पादन विश्वसनीयता बना सकता है जो वैश्विक कंपनियाँ माँगती हैं?
स्थिर बिजली, तेज़ माल परिवहन, प्रशासनिक स्पष्टता, और यह भरोसा कि जो वादा हुआ था वह ज़मीन पर भी मिलेगा।
वियतनाम बड़ा बाज़ार नहीं था, फिर भी आगे बढ़ा, क्योंकि उसने यह विश्वसनीयता दी।
भारत की परीक्षा बीजिंग से तुलना में नहीं, अपनी इसी विश्वसनीयता में है। और यह विश्वसनीयता किसी योजना की घोषणा से नहीं, उसके निरंतर क्रियान्वयन से बनती है।
सबसे बड़ा ख़तरा जमीन पर है
तो सबसे बड़ा जोखिम कहाँ है? वहीं, जहाँ भारत हमेशा सबसे ज़्यादा संघर्ष करता रहा है। ज़मीन पर।
मान लीजिए किसी पार्क में बिजली अस्थिर रही।
मान लीजिए सिंगल-विंडो व्यवस्था फिर वही पुरानी बहु-स्तरीय मंज़ूरी बनकर रह गई, सिर्फ़ एक नए नाम के साथ।
मान लीजिए माल परिवहन वादे के मुताबिक़ तेज़ नहीं हुआ।
तब plug-and-play का पूरा वादा एक ही झटके में खोखला हो जाएगा। और विश्वसनीयता एक बार टूटे तो दोबारा बनाना सबसे कठिन काम है, क्योंकि निवेशक की याददाश्त लंबी होती है।
दूसरा ख़तरा माँग का है। पार्क बना देना आधा काम है। उन्हें लगातार निवेश, निर्यात और उत्पादन गतिविधि से भरना असली काम है।
एक ख़ाली, चमकदार औद्योगिक पार्क सफलता नहीं, एक महँगी विफलता का स्मारक होता है।
भारत के पास ऐसे स्मारकों की कमी नहीं रही। सरकार का अनुमान है कि BHAVYA योजना से लगभग पंद्रह लाख प्रत्यक्ष रोज़गार पैदा होंगे। पर यह अनुमान है, परिणाम नहीं, और दोनों के बीच का फ़ासला ही असली कहानी है।
तीसरा, और सबसे बुनियादी, जोखिम संरचनात्मक है।
चीन के केंद्रीकृत मॉडल में फ़ैसले ऊपर से नीचे तक बिना घर्षण के उतरते हैं। भारत का लोकतांत्रिक और संघीय ढाँचा अधिक जटिल है, और यह जटिलता कोई दोष नहीं, उसकी प्रकृति है।
पर यहाँ भूमि की राजनीति है, केंद्र-राज्य की खींचतान है, और स्थानीय प्रशासन की असमान क्षमता है।
भारत की चुनौती सिर्फ़ उद्योग बनाना नहीं है। चुनौती लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर औद्योगिक गति पैदा करना है। यह कठिन है। और शायद इसी कठिनाई में भारत की सबसे असली परीक्षा छिपी है।
अनसुलझा सवाल
तो लौटते हैं वहीं, जहाँ से बात शुरू हुई थी। एक तोप का गोला, और यह सच कि लंबा युद्ध उत्पादन से चलता है।
BHAVYA योजना को सिर्फ़ आर्थिक योजना मानना इसकी अहमियत घटाना है।
यह उस बड़े बदलाव का हिस्सा है जिसमें भारत धीरे-धीरे समझ रहा है कि राष्ट्रीय शक्ति न सिर्फ़ सेना से बनती है, न सिर्फ़ बाज़ार के आकार से। उसके पीछे उत्पादन की गहराई होती है, आपूर्ति श्रृंखला की मज़बूती होती है, और संकट के बीच टिके रहने की वह क्षमता होती है जो किसी परेड में नहीं दिखती।
पर योजना की मंज़ूरी और योजना की सफलता दो अलग चीज़ें हैं, और भारत का इतिहास इस फ़ासले से भरा है। सौ पार्कों की घोषणा अभी कागज़ पर है। उसे ज़मीन तक उतरने में वही बाधाएँ झेलनी होंगी जिन्होंने पिछली योजनाओं को निगला।
इसलिए सवाल यह नहीं कि भारत कितने पार्क बना सकता है। सवाल यह है कि क्या वह एक ऐसी औद्योगिक व्यवस्था खड़ी कर पाएगा जो आर्थिक वृद्धि, तकनीकी निर्माण और राष्ट्रीय सुरक्षा, तीनों को एक साथ संभाले।
और यह सब एक लोकतांत्रिक देश में, उस गति से, जो किसी संकट की घड़ी बिना पूछे माँग लेती है। एक तानाशाही औद्योगिक गति आदेश से पैदा करती है। एक लोकतंत्र को वह गति सहमति, समन्वय और निरंतरता से बनानी पड़ती है, जो कहीं ज़्यादा कठिन रास्ता है।
यहीं घोषणा का उत्साह ख़त्म होता है, और असली काम शुरू होता है। बाक़ी सब अगले छह साल की ज़मीनी रिपोर्ट में लिखा जाएगा, किसी कैबिनेट नोट में नहीं।

